योग में कुण्डलिनी और हृदय शास्त्रीय चिन्तन
August 24, 2018 • Navlekha Team

गत कुछ दशकों में 'योग' शब्द विश्वभर में सुविदित हो गया है। इसकी विश्वजनीन ख्याति का आधार तो योगासनों से मानव को होनेवाले लाभ ही प्रमुखतः माने जा सकते हैं। विश्व के अधिकतर देशों ने वर्ष के सबसे बड़े दिन (21 जून) को योग दिवस के रूप में मनाए जाने के भारत के प्रस्ताव का समर्थन देकर योग को जब से वैश्विक बनाया है, तब से उस दिन योगासनों का प्रदर्शन ही भारत तथा अन्य देशों में प्रमुखतः होता है। उसे ही आज का नागरिक 'योगा' कहता है। मैं विनोद में बहुधा कहा भी करता हूँ कि हमारे छहदर्शनों में से एक ‘योग’ जब से विदेश यात्रा करके अंग्रेज़ बनकर 'योगा' नाम से विख्यात हुआ, तब से घर-घर में लोकप्रिय हो गया। आज इसकी पहचान आसन और प्राणायाम के रूप में ही अधिक है, किन्तु ये दोनों तो आठ अंगवाले (अष्टांग) योग के केवल दो अंग हैं। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि- इन आठ अंगों को तो योग का सामान्य स्वरूप माना जाता है, किन्तु हमारे छह आस्तिक दर्शनों में से एक योगदर्शन का स्वरूप इन आठ अंगों से कहीं ऊपर उठकर परम तत्त्व के ज्ञान से जुड़नेवाले चिन्तन और अभ्यास से सम्बद्ध है जो मानव जीवन की संजीवनी है।

 

अन्त में अभिलिखित है। गीता ब्रह्मविद्या और योगशास्त्र है। यहाँ योग से तात्पर्य वह योग नहीं है जो व्यायाम के रूप में आसन और प्राणायाम करवाता है। यहाँ योग का बहुत व्यापक अर्थ है। कुछ संकेत तो स्वयं गीता में ही उपलब्ध है- योगः कर्मसु कौशलम्, समत्वं योग उच्यते, योगो नष्टः परन्तप- ऐसी शतशः अभिव्यक्तियाँ ‘योग’ शब्द को अत्यन्त व्यापक अर्थ देती हैं। संस्कृत के शब्दकोशों में तो योग के शतशः अर्थ और तात्पर्य व्याख्यात मिल जाएँगे।

सांख्य और योग । योग मानव जीवन को परम तत्त्व से जोड़नेवाली विद्याएँ बतानेवाला दर्शन रहा है। हमारे छहों दर्शन (इनके अतिरिक्त तीन नास्तिक दर्शन भी) ज्ञान के सभी आयामों की स्पष्ट व्याख्या करनेवाले शास्त्र हैं। इनमें सांख्य समस्त सृष्टि का विज्ञान है, योग सृष्टि का और उसके नियन्ता का भी ज्ञान देनेवाला विज्ञान माना जाता है। यह जानकर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि हमारे छह आस्तिक दर्शनों में भी तीन सांख्य, मीमांसा और वैशेषिक- ईश्वर को नहीं मानते। योग, वेदान्त और न्याय- ये ईश्वर को मानते हैं। कपिल मुनि द्वारा प्रणीत सांख्य समस्त सृष्टि की व्याख्या करता है, किन्तु कोई ईश्वर इसे बनाता है या बिगाड़ता है, ऐसा नहीं मानता। योगदर्शन ईश्वर को मानता है, अतः उसे ‘सेश्वर सांख्य' कहा गया है। यह भी एक कारण है कि दुनिया को सांसारिक आपाधापी से ऊपर उठकर किसीपरम तत्त्व से उन्मुख होने का उपदेश देनेवाले शास्त्र को अधिक वाञ्छनीय माने जाने के कारण योग के प्रति श्रद्धा की उद्भावना करना भारतीय मनीषा को अधिक ग्राह्य हुआ, अतः योग और योगी भारत में अधिक पूज्य हुए। योग-सम्बन्धी प्राचीन चिन्तन में एक संज्ञा ‘कुण्डलिनी' भी आती है जो अपेक्षाकृत अल्पज्ञात रही है।

कुण्डलिनी
कुण्डलिनी (अथवा कुलकुण्डलिनी) एक ऐसी रहस्यात्मक संज्ञा है जो विभिन्न साधना-मार्गों से संबद्ध है और जो शाताब्दियों से तन्त्र, योग आदि रहस्यात्मक साधनाओं का विशिष्ट आधार रही है। इस पर विभिन्न अभिगमों के अधीन बड़े ज्ञानवर्धक अध्ययन भी हुए हैं। प्राचीन काल से ही साधनों की सफलता के लिए ‘कुण्डलिनी का जागरण' करना एक विशिष्ट ध्येय रहा है। बताया यह जाता है कि मानवशरीर में मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा- ये जो छह चक्र हैं, अर्थात् नाड़ी-संस्थान हैं जिन्हें आधुनिक विज्ञान प्लेक्सस (Plexus) नाम से पुकारता है (जिसका अधिकृत भारतीय पर्याय है जालक या तन्त्रजालक), उनके ऊपर मानव मस्तिष्क भाग में सहस्रदल कमल है। कुण्डलिनी मानव- शरीर में स्वाधिष्ठान और मणिपूर चक्र के बीच में स्थित नाड़ी है जो साँप की तरह कुण्डली मारकर बैठी लगती है, अतः कुण्डलिनी कही जाती है। इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना, आदि नाड़ियाँ भी मानव शरीर में होती हैं। उनके माध्यम से कुण्डलिनी में स्थित चैतन्य-शक्ति को जागृत कर सहस्रदल कमल तक पहुँचा देना साधना की उत्कृष्ट परिणति मानी गई है।

यह आधारभूत सिद्धान्त तन्त्रशास्त्र को भी मान्य है, योग को भी। इनमें पारस्परिक समन्वय कब हुआ, यह भी रुचिकर अध्ययन का विषय है और आज का विज्ञान कुण्डलिनी की इस अवधारणा को किस रूप में देखता है, यह भी। प्रसन्नता की बात है कि पिछले दिनों कुण्डलिनी के इन तीनों आयामों पर अध्ययन, अनुशीलन आदि होते रहे हैं। जयपुर के चिकित्सक, आयुर्विज्ञान-विशारद एवं साहित्यकार डॉ. श्रीगोपाल काबरा ने कुण्डलिनी की कायवैज्ञानिक स्थिति को भी स्पष्ट किया है और प्राचीन अवधारणाओं से उसका समन्वय भी किया है। इस प्रकार तीनों अभिगमों से कुण्डलिनी की परख होने लगी है, तान्त्रिक, यौगिक और कायवैज्ञानिक वस्तुतः साधना के समय, ध्यान द्वारा, ऑटोसजेशन द्वारा, निम्न-भाग में स्थित कुण्डलिनी को प्रेरित करना तंत्र और योग- दोनों में मान्य प्रक्रिया है जिसे आधुनिक विज्ञानवेत्ता न्यूरोट्रांसमिटर की प्रक्रिया जागृत करना कहते हैं। जिस प्रकार आधुनिक विज्ञान ने षट्चक्रों को प्लेक्सस के रूप में स्पष्ट कर दिया है, लगभग उसी तरह न्यूरोट्रांसमीटर माध्यम से इफेक्टिव वोलीशन-जैसी प्रक्रिया से मानसिक साधना करने को भी विज्ञानानुमोदित कहा है। योग में और तन्त्र में कुण्डलिनी के महत्त्व का कारण तो स्पष्ट ही है। तन्त्र की साधना का चाक्षुष आधार जिस प्रकार यन्त्र है, वाचिक आधार मन्त्र है, उसी के साथ मानसिक मनन-प्रक्रिया भी आवश्यक है जिसके बिना मन्त्र की सिद्धि नहीं हो सकती। इस मानसिक साधना की आन्तरिक प्रक्रिया का भौतिक आधार शरीर में स्थित नाड़ियाँ, शिराएँ आदि ही तो हो सकती हैं। इनमें ऊर्ध्वस्थ नाड़ियाँ को शारीरिक प्रयत्न से, सम्प्रेषण से प्रेरित नहीं किया जा सकता। अपेक्षाकृत निम्न भाग में स्थित नाड़ियाँ और शरीरांग आपके प्रेरित करने से, जोर लगाने से, प्रयास करने से स्पन्दित हो सकते हैं। स्वाधिष्ठान और मूलाधार चक्र को मानव प्रारम्भ से ही स्पन्दित करता रहा है। उनके निकट स्थित कुण्डलाकार नाड़ी का प्रथम स्पन्दन ऊर्ध्वगमन के द्वारा अनेक सत्परिणाम दे सकता है, ध्यान का, धारणा का, मनोनियन्त्रण का प्रारम्भ ऐसे प्रयत्नों से ही होता है (जिसे अंग्रेजी में इफेक्टिव वोलीशन कहा जा सकता है) कुण्डलिनी नाड़ी या शक्ति ऐसे स्पन्दन का प्रथम आधार बन सकती है। इसीलिए तान्त्रिक साधना में सदियों से इसका महत्त्व माना जा रहा है। तन्त्रशास्त्र के ग्रन्थों में भी यह महत्त्व वर्णित है तथा जॉन वुडरफ (1865-1936)जैसे उन पाश्चात्य मनीषियों के ग्रन्थों में भी, जिन्होंने तन्त्रशास्त्र का गहन अध्ययन कर ‘द सर्पेन्ट पावर' (1919) और ‘गारलैण्ड ऑफ लैटर्स' (1922), आदि महत्त्वपूर्ण आधार-ग्रन्थ अंग्रेज़ी में लिखे, कुण्डलिनी की सर्पाकार आकृति और शक्ति पर उनमें पूरा विवरण देखा जा सकता है। कुछ समय पूर्व मोतीलाल बनारसीदास द्वारा प्रकाशित एक अंग्रेज़ी-ग्रन्थ (‘कुण्डलिनी' नाम से) भी मेरे देखने में आया था।

योग की तो परिभाषा ही चित्तवृत्तिनिरोध है। चित्तवृत्तियों का नियन्त्रण मानसिक प्रक्रियाओं से तो होता ही है, वाचिक, शारीरिक और प्रक्रियाएँ भी उसके लिए अत्यावश्यक हैं। आसन, प्राणायाम आदि शारीरिक प्रक्रियाएँ तथा ध्यान, धारणा आदि मानसिक एवं मन्त्रोच्चारण आदि वाचिक प्रक्रियाएँ योग-साधना में अनिवार्य रूप से प्रयुक्त होती हैं। कुण्डलिनी के आसपास स्थित चक्रों के भौतिक प्रेरण से योग की मानसिक आधारभूमि बनती है, उसी से ध्यान, धारणा और निदिध्यासन सिद्ध होते हैं। इसी दृष्टि से तन्त्र की कुण्डलिनी का महत्त्व योग में भी समाहित हो गया। यही कारण है कि पिछले दिनों योग के क्षेत्र के अनेक लेखकों ने कुण्डलिनी से सम्बद्ध प्रभूत लेखन किया है। आशा है अनुशीलन की यह प्रक्रिया सतत वर्तमान और वर्धमान रहेगी।यह कुण्डलिनी तो केवल प्राचीन शास्त्रों में ही अभिहित है, किन्तु आधुनिक योग- प्रशिक्षक यह भी स्पष्ट करते हैं कि योग- साधना हमारे हृदय को भी पुष्ट करती है, शारीरिक बल भी देती है, मानसिक बल भी। हृदय पर केवल आधुनिक जीवशास्त्र ने ही चिन्तन किया हो, ऐसा नहीं है। योगशास्त्र ने भी हृदय पर पूर्ण अनुशीलन किया है।

हृदय: प्राचीन वाङ्मय में ।
भारतीय संस्कृति और भारतीय साहित्य ने ‘हृदय' को गहराई से समझा है, उसके प्रत्येक आयाम को परखा है, इसकी हर धड़कन सुनी है और उसे मज़बूत बनाए रखने के अनेक उपाय अपनाए हैं। साहित्य तो हृदय से हृदय की बात पहुँचाने का ही माध्यम है, अतः उसने तो हृदय को सर्वोपरि महत्त्व दिया है। केवल सहृदय व्यक्ति ही साहित्य की गहराई तक जा सकता है, यह साहित्यकारों का सिद्धान्त है। साहित्य हृदय को छू लेता है, हृदय की गहराई तक पहुँचता है- यह कहा जाता रहा है। साहित्य का यह हृदय, शरीर-विज्ञानवाला हृदय नहीं है जो एक प्रवाह को नियन्त्रित करता है। साहित्य का हृदय भावनाओं, संवेदनाओं आदि से ही सम्बद्ध रहता है, अतः वह मन, अन्तःकरण और अन्तश्चेतना के पर्याय के रूप में ही वहाँ प्रयुक्त हुआ है। आजकल जिस हृदय ने विश्व को आन्दोलित कर रखा है, जिन हृदय-रोगों, हृदयघातों आदि के लिए अस्पताल कमाई कर रहे हैं, वह हृदय कुछ अलग है, किन्तु उसका भी गहरा विवेचन भारतीय वाङ्मय में हुआ है। शरीर के एक प्रमुख अंग के रूप में जीवन को नियन्त्रित करनेवाले हृदय को समझने और उसको स्वस्थ रखने का भी समुचित प्रयास भारतीय मनीषी सहस्राब्दियों से करते- करवाते रहे हैं। इससे संबंधित प्रभूत साहित्य भी भारत में उपलब्ध है। विश्व की प्राचीनतम भाषा संस्कृत में उस हृदय पर भी बहुमूल्य जानकारी निहित है।

हृदय को स्वस्थ रखने के उपाय, उसकी चिकित्सा आदि पर विपुल जानकारी आयुर्वेद में तो उपलब्ध है ही, जिस पर इन दिनों हिंदी में भी बहुत कुछ लिखा गया है; किन्तु उपनिषदों में, विशेषकर योग और तंत्र से सम्बद्ध वाङ्मय में हृदय पर प्रत्यक्ष, परोक्ष और प्रतीकात्मक रूप से इतना लिखा गया है जिसकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। आज योग ‘योगा' बनकर विश्वभर में अपने झण्डे गाड़ रहा है। अनेक योगगुरु इसके बल पर पुज रहे हैं। योग से शरीर और मन स्वस्थ रहते हैं, हृदय सशक्त रहता है- यह योगगुरुओं का दावा है। इसके लिए आसन, व्यायाम, कपालभाति आदि क्रियाएँ तो बनाई ही जाती हैं, कुछ शास्त्रज्ञ योगगुरु इनसे संबंधित प्राचीन ग्रन्थों का नाम भी कभी ले लेते हैं। इसमें से अधिकांश संस्कृत-भाषा से परिचित नहीं हैं, उस पर अधिकार नहीं रखते, इसलिए मूल शास्त्रों को वे बहुधा उद्धृत नहीं करते, यह बात अलग है; किन्तु प्राचीन शास्त्रों में हृदय तंत्र का जिस प्रकार वर्णन किया गया है, वह आज भी चमत्कारजनक है, उपयोगी है। उसका गहन अध्ययन नहीं हो पाया है, किन्तु शोधार्थियों द्वारा ऐसा किया जा सकेगा, यह आशा बँधी हुई है।

योगदर्शन और शास्त्र ने शरीर की महत्त्वपूर्ण तन्त्रजालकों (Plexus) की स्थितियों का विशेष, किन्तु प्रतीकात्मक वर्णन किया है। आयुर्वेद की प्रत्यक्ष शारीरक (anatomy) शाखा तो इन अंगों का शरीर के अवयवों के रूप में वर्णन करती है, किन्तु योग ने इन तंत्रजालकों को अत्यन्त सुकुमार होने के कारण कमल की प्रतीक लेकर वर्णित किया है। शरीर के इन छह तंत्रजालकों को योग ‘षट्चक्र' कहता है। प्रत्येक चक्र को कमलदल ‘पद्म' का नाम दिया गया है और तंत्रिकाओं की संख्या आदि के आधार पर इन पद्मों को चतुर्दल, षड्दल, अष्टदल आदि कहकर कमल के रूप में इनका विवरण दिया गया है, इसके साथ ही इसका आकार भी ज्यामितिक विधि से चतुष्कोण, षट्कोण आदि रूपों में वर्णित है। इस कोण चित्रण को प्रतीकात्मक होने के कारण तंत्रशास्त्र ने भी स्वीकार किया है।तान्त्रिक क्रियाओं और शास्त्रों जो यन्त्रपूजन होता है, तन्त्र, मन्त्र और यन्त्र के साथ जो शाक्त आदि उपासनाएँ की जाती हैं, उनमें भी इन चक्रों का पूजन, प्रतीकात्मक साधना के रूप में किया जाता है।

षट्चक्र
मानव शरीर के बीच से लेकर ऊपर तक विद्यमान उन तंत्रजालकों को जो सबसे ऊपर स्थित मस्तिष्क को जीवनी शक्ति पहुँचाते हैं, छह चक्रों का नाम दिया गया है। सबसे नीचे मूलाधार चक्र, उससे ऊपर स्वाधिष्ठान, नाभि में मणिपूर, हृदय में अनाहत, कण्ठ में विशुद्ध और भौंहों के बीच आज्ञा-चक्र। ये सब मस्तिष्क में स्थित शून्य-चक्र अर्थात् सहस्रदल कमल को जीवनी शक्ति पहुँचाते हैं। मस्तिष्क की अनन्त नाड़ियाँ, जिन्हें आजकल ‘न्यूरोन कहा जाता है, सहस्रदल कमल के रूप में ‘सहस्रार' नाम से वर्णित हैं तथा ये षट्चक्र क्रमशः चतुर्दल, षट्दल, द्वशदल, द्वादशदल, षोडशदल और द्विदल कमल के रूप में वर्णित हैं जिन्हें योगविद्या पूरी तरह समझाती है। इन्हें नक्शे के रूप में ज्यामितिक आकार देते हुए मंत्रों का रूप भी दिया गया है और क्रमशः चतुष्कोण, गोल, त्रिकोण, षट्कोण, कुछ गोल और लिंगाकार, इस प्रकार के नक्शे से समझाया गया है। योगविद्या को व्यवहारिक रूप से समझाने हेतु जो ग्रन्थ पिछले दिनों लिखे गए हैं, उनमें भी यह सब स्पष्ट दिया गया है। पं. डॉ. राधेश्याम परमहंस ने, जो योगाचार्य भी हैं, त्रिपुराम्बा प्रकाशन से 'षट्चक्र ध्यान । योग' नामक जो पुस्तक निकाली है, उसमें भी इनका विशद विवरण है।

योग के इन षट्चक्रों में हृदय को अनाहत चक्र के रूप में, द्वादश दल कमल के रूप में तथा षट्कोण यन्त्र के रूप में वर्णित किया गया है। तन्त्रोपासना में भी स्थान-स्थान पर षट्कोण-यंत्र की पूजा होती है। यह हृदय से ही सम्बद्ध है। हृदय के द्वादश दल रक्त को लाने, ले जाने, पहुँचाने और नियन्त्रित करने का कार्य किस प्रकार करते हैं, यह भी प्रतीकात्मक रूप से समझाया जाता है। कुछ विद्वान् तो इसीलिए ‘हृदय' शब्द का भी विश्लेषण कर समझाते हैं कि इसमें हृ=हरण करने अर्थात् एक को ले जाने का सूचक है, द=रक्त को देने का तथा य=यन्त्रित अर्थात् नियन्त्रित करने का सूचक है। इन द्वादश दलों के बीजमंत्र भी बनाए गए हैं कं खं गं घं से लेकर टं ठं तक, इनकी काकिनी शक्ति, ईशान देव, मृग वाहन और वायु तत्त्व बतलाए गए हैं जो विवरण रक्तप्रवाह के विभिन्न प्रतीकों से पूरी । तरह सामञ्जस्य रखता है। योगक्रियाओं के समय ध्यान के लिए योगगुरु विभिन्न प्रकार की साधनाएँ बतलाते हैं, ध्यान और एकाग्रता से हृदय को बल मिलता है- यह भी समझाते हैं। रक्त का प्रवाह सदा समान, सतत, अनाहत रहना चाहिए, इसीलिए इसे अनाहत चक्र कहा गया है।

योगशास्त्र के इन विवरणों को प्रतीकात्मक रूप से समझ लेना सरल नहीं है, किन्तु यौगिक क्रियाओं द्वारा हृदय को स्वस्थ रखने की जो क्रिया बतलाई जाती है, वह सबको समझ में आ सकती है। इसलिए 'योगा' विश्व में लोकप्रिय हो रहा है। प्राणायाम से हृदय की रक्तवाहिनी नाड़ियों
को लाभ पहुँचता है, यह तो स्पष्ट ही है। कपालभाति यद्यपि अन्त्रजाल को स्वस्थ रखने का प्रमुख कार्य करती है, किन्तु उससे हृदय को भी लाभ पहुँचता है। इसी प्रकार अनेक योगासन ऐसे हैं जो हृदय को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं। सूर्य नमस्कार से भी हृदय को लाभ पहुँचता है। तभी तो हमारे यहाँ सदियों से प्रतिदिन के धार्मिक कृत्यों में, संध्यावन्दन में, प्राणायाम, सूर्यनमस्कार, आसन आदि दिनचर्या के अंग के रूप में इस प्रकार विहित किए गए हैं कि ये जीवनशैली का अंग बन जायें।

हृदय को सशक्त रखने हेतु आधिभौतिक उपायों में आहार का नियन्त्रण और जड़ी-बूटियों, फलों, गुणकारी वनस्पतियाँ, सात्त्विक अन्नों आदि से बने भोज्य पदार्थों के सेवन का विधान किया जाता रहा है। गीता भी स्पष्ट कहती हैरस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृदया आहाराः सात्त्विकप्रियाः (भगवद्गीता, 17.8), अर्थात् सात्त्विक लोग ऐसे आहार लेते हैं जो हृदय को बल दे। हृदय के लिए हितकारी कौन-कौन से आहार होते हैं, इसका विवरण तो इन दिनों सर्वत्र उपलब्ध है। कोलेस्ट्रेल से कैसे बचें, इस बारे में प्रबुद्ध व्यक्ति सतर्क रहते हैं। पहले भी विधान किए जाते रहे हैं कि गोघृत निरापद रहता है, तामस पदार्थ हृदय के लिए अहितकारी हैं। इस प्रकार हृदय के भौतिक रूप का भी विस्तृत विवेचन भारतीय साहित्य में मिलता है। हृदय को निर्मल रखने के लिए ई-द्वेष न करने, तनाव से मुक्त रहने, ध्यान आदि करने के आध्यात्मिक उपाय तो सुविहित हैं। ही।