शौक डाक-टिकटों के संग्रह का
August 29, 2019 • Navlekha Team

गन्दर और उपयोगी वस्तुओं का संग्रह मानव का स्वभाव है। हर चीज को संग्रह करने में मज़ा है और हर एक चीज के संग्रह के साथ कुछ-न-कुछ ज्ञान प्राप्त होता है, लेकिन डाक-टिकटों के संग्रह का मजा कुछ और ही है। हर डाक-टिकट किसी-न-किसी विषय की जानकारी देता है, उसके पीछे कोई-न-कोई जानकारी ज़रूर छुपी होती है। यदि हम इस छुपी - प्रशांत हुई कहानी को खोज सकें, तो यह हमारे सामने ज्ञान की रहस्यमय दुनिया का नया पन्ना खोल देता है। इसीलिए तो डाक-टिकटों का संग्रह विश्व के सबसे लोकप्रिय शौक में से एक है। डाक-टिकटों का संग्रह हमें स्वाभाविक रूप से सीखने को प्रेरित करता है, इसलिए इसे प्राकृतिक शिक्षा- उपकरण कहा जाता है। इसके द्वारा प्राप्त ज्ञान हमें मनोरंजन के माध्यम से मिलता है, इसलिए इन्हें शिक्षा का मनोरंजक साधन भी माना गया है।

डाक-टिकट किसी भी देश की विरासत की चिन्नमय कहानी हैं। डाक-टिकटों का एक संग्रह विश्वकोश की तरह है, जिसके द्वारा हम अनेक देशों के इतिहास, भूगोल, संस्कृति, ऐतिहासिक घटनाएँ, भाषाएँ, मुद्राएँ, पशु-पक्षी, वनस्पतियों और लोगों की जीवनशैली एवं देश के महानुभावों के बारे में बहुत सारी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। डाक-टिकट का इतिहास FOTOSTAGE: करीब 177 साल पुराना है। विश्व का पहला डाक टिकट 1 मई, 1840 को ग्रेट ब्रिटेन में जारी किया गया था जिस पर ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया का चित्र छपा था। एक पेनी मूल्य के इस टिकट के किनारे सीधे थे यानी टिकटों DON को अलग करने के लिए जो छोटेछोटे छेद बनाए जाते हैं, वे प्राचीन डाक टिकटों में नहीं थे। इस समय तक उनमें लिफाफे पर चिपकाने के लिए गोंद भी नहीं लगा होता था। इसका उपयोग 6 मई, 1840 से प्रारम्भ हुआ। टिकटसंग्रह में रुचि रखनेवालों के लिए इस टिकट का बहुत महत्त्व है; क्योंकि इस टिकट से ही डाक-टिकट संग्रह का इतिहास भी शुरू होता है। भारत में पहला डाक-टिकट 1 जुलाई, 1852 को सिंध प्रांत में जारी किया गया जो केवल सिंध प्रांत में उपयोग के लिए सीमित था। आधे आने मूल्य के इस टिकट को भूरे कागज पर लाख की लाल सील चिपकाकर जारी किया गया था। यह टिकट बहुत सफल नहीं रहा; क्योंकि लाख टूटकर झड़ जाने के कारण इसको संभालकर रखना संभव नहीं था। फिर भी ऐसा अनुमान किया