भारतवंशियों के साथ
September 30, 2019 • Navlekha Team

-भारतवंशियों के साथ पद्म भूषण डॉ. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी विदेशों में भारतीय संस्कृति के राजदूत, ब्रिटेन में हिंदी के प्रणेता और हिंदीभाषियों के लिए प्रेरणा-स्रोत थे। विश्वभर में फैले भारतवंशियों के लिए 'प्रवासी भारतीय दिवस' मनाने की संकल्पना उन्हीं की थी। प्रवासी भारतीयों के लिए भारतवंशी' शब्द का प्रयोग भी सर्वप्रथम उन्होंने ही किया। डॉ. सिंघवी ने हिंदी के वैश्वीकरण और हिंदी के उन्नयन की दिशा में सजग, सक्रिय और सार्थक प्रयास किए। विश्व हिंदी सम्मेलन के आयोजनों में सदा उनकी अग्रणी भूमिका रहीभारतीय राजदूत के रूप में उन्होंने ब्रिटेन में भारतीयता को पुष्पित करने का प्रयास तो किया ही, अपने देश की भाषा के माध्यम से न केवल प्रवासियों अपितु विदेशियों को भी भारतीयता से जोड़ने की कोशिश की वह संस्कृतियों के मध्य सेतु की तरह अडिग और सदा सक्रिय रहे। प्रवासी भारतीयों के लिए लिखा उनका यह लेख आज भी प्रासंगिक है। -संपादक

वासी भारतीय दिवस की पृष्ठभूमि का इतिहास मुझे स्मृति-वीथियों में ले जाता है। अपने छात्र जीवन में मैंने एशिया और यूरोप में भारतीय सभ्यता के प्रभाव का अध्ययन किया था और एक तरह से मैंने तब सहस्रों वर्षों पूर्व भारतीय सभ्यता की यात्राओं के मानचित्र को देखा और समझा था। शायद उस पुरातन युग के प्रवासी भारतवंशियों द्वारा उनके बहुआयामी गरिमामय अवदान की यशगाथाएँ तभी मेरी चेतना में प्रविष्ट हो गई थीं। एक दूसरी स्मृति है, कैलिफोर्निया में जब मैं शोध एवं अध्यापन का कार्य कर रहा था, तब एक व्यक्ति मुझे मिला, जिसने मुझे बताया कि वह एक प्रवासी भारतीय का वंशज है और अपनी जड़ों को खोजना और पाना चाहता है। उनके पूर्वज शायद 19वीं शताब्दी के अंत में कैलिफोर्निया आए थे। वे अकेले थे क्योंकि उस समय भारतीय महिलाएँ साथ नहीं गई थीं। वे एक मैक्सिकन महिला के साथ रहने लगे और इस प्रकार इस 'भारतवंशी' युवक की पहचान कैलिफोर्निया में प्रवासी मैक्सिको के लोगों में घुल-मिल गई और लगभग खो गई। वह युवक अपनी भारतीय जड़ों को खोजने के लिए आतुर था। यह बात लगभग 48 वर्ष पहले की है। उन दिनों भारत के कुछ थोड़े-से लोग ही संयुक्त राज्य अमेरिका में थे और उनमें से अधिकांश लोग उच्च शिक्षा के लिए वहाँ गए हुए थे, किन्तु तब मैंने देखा कि अमेरिकी समाज कई अलगअलग देशों के लोगों का एक मिला-जुला संस्करण था। पहले एक सिद्धान्त की चर्चा होती थी, जिसके अनुसार जो भी अमेरिका में आकर बस जाता, वह अपनी पुरानी संस्कृति और भाषाई पहचान खोकर शीघ्र ही अमेरिकी हो जाता था। वास्तव में यह एक कपोल-कल्पित अवधारणा थीं। मैंने तब स्वयं देखा कि अमेरिका में संस्कृतियों