पुस्तक की विकास-यात्रा
August 24, 2018 • Navlekha Team

ज्ञान की अनन्त रश्मियों का सूर्य जब अपने दिव्य स्यन्दन पर सवार होकर अखिल ब्रह्माण्ड का चक्रमण करता है, तब अनेक नवोढ़ा श्रुतियाँ उसका अनुगमन करती हैं। ज्ञान की यह परम्परा ‘श्रुति' के सोपान से प्रारम्भ होती है। श्रुति से प्रारम्भ हुआ एक मार्ग वेद की गुरु गम्भीर किन्तु सुदर्शना उपत्यकाओं की ओर जाता है, तो दूसरा मार्ग संगीत की रसवन्ती सरिताओं के बीच आनन्द का अनुसन्धान करता है। ज्ञान के इस मार्ग का निर्माण भारतीय ऋषियों ने अपनी निष्ठा, साधना और तपस्या के बल पर किया है।शताब्दियों तक नवोढ़ा श्रुतियों की असंख्य शिविकाओं का दायित्व गुरु-शिष्य-परम्परा के सुदृढ़ स्कन्धों पर टिका रहा। श्रुतियों के गर्भ से उत्पन्न हुईं अगणित ऋचाएँ अपने अकुण्ठ सौन्दर्य से वाङ्मय के विशाल प्रांगण का श्रृंगार करने लगीं। ज्ञान-कुञ्ज की नयी नवेली ऋचाओं का परिणय वेद के मण्डलों के साथ हुआ। शनैः शनैः वयोवृद्ध ज्ञान का परिवार बृहत्तर होता गया। श्रुतियों के वंश का विस्तार वेद, उपनिषद्, आरण्यक, ब्राह्मण आदि के पंक्तिपावन कुलों में विभक्त होता गया। ज्ञान के इन औरस पुत्रों ने पुराणों की सर्वगुणसम्भवा षोडशी कथांगनाओं से ब्याह रचाया। इसी बीच ‘लिपि' का जन्म हुआ। ऋषियों ने जब अपने पुनीत पाण्डु से लिपि को दुलराया, तब ‘पाण्डुलिपि का प्राकट्य हुआ। इस प्रकार वाङ्मय के संस्कृति और संस्कारसम्पन्न परिवार के सुरक्षित बसेरे की आवश्यकता प्रतीत होने लगी। हिमालय के सुरम्य परिसर में बसे भोजवृक्षों ने जब अपने वल्कल से पण्डुलिपि का षोडशोपचार श्रृंगार किया, तब जाकर धरती पर तपस्विनी सती के समान सुशीला पुस्तकांगना का अवतरण हुआ। पुस्तक का धरत्री के अंक में धीरे धरे पग बढ़ाना कोई सामान्य घटना नहीं थी। अब वल्कलसंवीता पुस्तक के आ जाने से वाङ्मय का राजप्रासाद और भी मनोहर हो गया था। बतरस के आनन्द में अहर्निश डूबी सरस्वती को अब पुस्तक के रूप में प्रिय सखी मिल गयी थी। सरस्वती। पुस्तकप्रिया हो गयी थीं।

 

वीणा, माला और पुस्तक के साथ हंस पर आरूढ़ होकर जब सरस्वती ब्रह्मलोक से धरती का पर्यटन करने चलीं, तब ऋषियों के आश्रम में निवास करनेवाले असंख्य मेधावी शिष्यों ने सरस्वती के हस्ताम्बुज में विराजमान पुस्तक का अनेकविध अभिनन्दन किया। विद्यातीर्थ में अभिन्दित होकर पुस्तक का हृदय पुलकित हो उठा। तत्त्व-दर्शन की रंग-विरंगी शाटिकाओं से अलंकृत पुस्तकों का महत्त्व इतना बढ़ गया कि इनकी उपस्थिति मात्र से तीर्थ की पवित्रता का पुण्यफल प्राप्त होने लगा। स्वयं भगवान् शिव ने भगवती पार्वती से पुस्तक के माहात्म्य का वर्णन करते हुए कहा कि हे पार्वती! जिस घर में सदैव पुस्तकें विराजमान रहती हैं, वह घर मन्दिर के समान हो जाता है और उस घर में काशी आदि सभी तीर्थ निवास करते हैं- पुस्तकञ्च महेशानि यद्गृहे विद्यते सदा। काश्यादीनि च तीर्थाणि सर्वाणि तस्य मन्दिरे॥

-भूतशुद्धितन्त्र 17.6 भोजवृक्ष के वल्कल को धारण कर पाण्डुलिपि से पुस्तक तक की यात्रा रहस्य और रोमांच से भरी हुई है। आज भी भोजवृक्ष का नाम सुनते ही उन प्राचीन पाण्डुलिपियों का स्वरूप मनः मस्तिष्क में कौंध उठता है, जिन्हें भोजपत्रों ने अपने वक्ष पर सहेज रखा है। कागज़ के आविष्कार से पूर्व लेखन-कला को विकसित करने का काम भोजपत्रों के माध्यम से ही किया जाता रहा। भोजपत्र पर लिखी हुई पाण्डुलिपियाँ सैकड़ों वर्षों तक संरक्षित रही हैं। भारतीय पुरातत्त्व संग्रहालयों में आज भी भोजपत्र पर लिखी सहस्राधिक पाण्डुलिपियाँ सुरक्षित हैं। यद्यपि भोजपत्र से प्राचीन रूस में कागज़ की मुद्रा ‘बेरेस्ता' के साथ साथ सजावटी वस्तुओं और ‘लाप्ती' नामक चरणपादुकाओं का निर्माण होता रहा है, तथापि पाण्डुलिपि के रूप में पुस्तक का सृजन करके भोजपत्रों ने संसार में अपने जन्म को कृतार्थ कर लिया है। वेद के ज्ञान को अपने वक्ष पर अंकित करनेवाले भोजपत्रों के सन्दर्भ में अपना ही लिखा एक मुक्तक याद आ रहा है- 

सर्ग-रचनावली के हरित सत्र हैं। रत्नगर्भा धरा के सघन छत्र हैं।
वेद के ज्ञान को वक्ष पर टाँकते, धन्यवादार्ह ये भोजतरु-पत्र हैं। -पुष्कल, पृ. 125

हिमालय के परिष्वंग में बसे ऋषिपुत्रों ने जहाँ भोजपत्रों पर पाण्डुलिपियों की रचना की, वहीं सुदूर दक्षिण के मनीषियों ने ताड़पत्रों पर ज्ञान का आलोक बिखेरा। ताड़ (ताल) के सूखे पत्तों पर लिखी पाण्डुलिपियाँ ‘तालपत्र' कही गयीं। पाण्डुलिपि के लिए तालपत्र का उपयोग एशिया के कतिपय भागों, विशेषतः दक्षिण भारत में 15वीं शती तक होता रहा। भोजपत्र और ताड़पत्र पर लिखी पाण्डुलिपियों के रख-रखाव और संरक्षण की चिन्ता भी अब मनीषियों को होने लगी थी। स्वयं पुस्तक भी अब अपनी चिन्ता करने लगी थी। तभी तो वह कहती है कि मुझे जल से, तेल से, शिथिल बन्धन से बचायें और मुझे मुर्ख के हाथ में कदापि न दें- 

जलाद्रक्षेत्तैलाद्रक्षेद्रक्षेच्छिथिलबन्धनात्।
मूर्खहस्ते न मां दद्यादिति वदति पुस्तकम्॥

संसार में पुस्तक के अवतरण ने विद्या के प्रचार-प्रसार में महनीय योगदान दिया है। यह पुस्तक की ही कृपा है कि मनुष्य जाति ने विद्या के वरदान से अपने आपको पशुवर्ग से श्रेष्ठ सिद्ध कर लिया है। इस तथ्य को संस्कृतज्ञों ने अनेकशः स्वीकार करते हुए लिखा है कि विद्या मनुष्य का विशिष्ट रूप है, गुप्त धन है। वह भोग देनेवाली, यशदात्री और सुखकारक है। विद्या गुरुओं की गुरु है। विदेश में वह मनुष्य की बन्धु है। विद्या बड़ी देवता है। राजाओं में विद्या की पूजा होती है, धन की नहीं। इसलिए विद्याविहीन पशु ही है-

विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्
विद्या भोगकरी यशः सुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः।

विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परं दैवतम्।
विद्या राजसु पूज्यते न हि धनं विद्याविहीनः पशुः॥

वस्तुतः विद्या अनुपम कीर्ति है। भाग्य का नाश होने पर वह आश्रय देती है, कामधेनु है, विरह में रति समान है, तीसरा नेत्र है, सत्कार का मन्दिर है, कुल-महिमा है, बिना रत्न का आभूषण है। इसलिए प्राचीन मनीषियों ने अन्य विषयों को छोडकर केवल विद्या का अधिकारी बनने का परामर्श दिया है-

विद्या नाम नरस्य कीर्तिरतुला भाग्यक्षये चाश्रयो

धेनुः कामदुधा रतिश्च विरहे नेत्रं तृतीयं च सा।

सत्कारायतनं कुलस्य महिमा रत्नैर्विना भूषणम्तस्मादन्यमुपेक्ष्य सर्वविषयं विद्याधिकारं कुरु॥

विद्या और पुस्तक- दोनों परस्पर आश्रित हैं। पुस्तक के अंक में विद्या का निवास है और विद्याविभूषित होने के कारण ही पुस्तक की महत्ता है। भोजपत्र और तालपत्र पर रची गयी पुस्तकों के अतिरिक्त चर्मपत्र पर भी पुस्तकें लिखी गई हैं। द्वितीय शताब्दी ई.पू. में प्राचीन यूनानी नगर परगामम (Pergamum) के शासक युमेनीज द्वितीय (Eumenes II “Savior: 197-159) ने। चर्मपत्र (Prchment) के प्रयोग की प्रथा का विधिवत् प्रवर्तन किया। यूमेनीज द्वितीय एक ऐसा पुस्तकालय स्थापित करना चाहते थे जो एलेक्जेंड्रिया के उस समय के सुप्रसिद्ध पुस्तकालय के समान बृहद् हो। इसके लिए नील नदी के तट पर उत्पन्न होनेवाले पापाइरस वृक्ष के मज्जे से निर्मित कागज़ की अनुपलब्धता के कारण पापाइरस के स्थान पर चर्मपत्र का व्यवहार प्रारम्भ हुआ। यह चर्मपत्र बकरी, सुअर, बछड़ा या भेड़ के चमड़े से तैयार होता था। उस समय इसका नाम कार्टा परगामिना (Charta Pergamena) था। ऐसे चर्मपत्र के दोनों ओर लिखकर पुस्तक के रूप में बाँध दिया जाता था। इस प्रकार ‘भोजपत्र' से प्रारम्भ हुई पुस्तक की विकास-यात्रा द्वितीय शताब्दी ई.पू. तक ‘चर्मपत्र' के सोपान पर चढ़ चुकी थी।

पुस्तक की विकास-यात्रा के अगले सोपान पर कागज़ के निर्माण की अहम भूमिका है। कागज़-निर्माण की कला का प्रथम सूत्रपात 105 ई. में चीन की इम्पीरियल अदालत से सम्बद्ध हानराजवंश के मुख्य शासक हान-हो-ती (88-105) के राजदरबार में साई-लून (48-121) नामक व्यक्ति ने किया था। भाँग, शहतूत आदि वनस्पतियों, वृक्ष के वल्कल एवं अन्य लताओं के तन्तुओं से कागज़-निर्माण की कला का प्रवर्तन करनेवाले साई-लून को ‘कागज़ के सन्त' के रूप अत्यधिक सम्मान प्राप्त हुआ। शनैः शनैः कागज़ की व्याप्ति पूरे विश्व में हो गयी। कागज़-निर्माण के पश्चात् 11 मई, 868 ई. को बौद्ध-धर्म के 'वज्रच्छेदिकाप्रज्ञापारमितासूत्र' (Diamond Sutra) नामक ग्रन्थ का सर्वप्रथम मुद्रण चीनी-भाषा में हुआ, जिसकी प्रति आज भी ब्रिटिश संग्रहालय में सुरक्षित है।

। सन् 1040 ई. में चीन के बाई शींग (990-1051) नामक व्यक्ति ने चीनी मिट्टी की सहायता से अक्षरों को तैयार किया, जिससे मुद्रण-कला के आदिम स्वरूप का विकास हुआ। चीन से विकसित हुई मुद्रण-कला शीघ्र ही पूरे विश्व में अपनी सार्थक उपस्थिति से पुस्तकों की श्रीवृद्धि करने लगी। जर्मनी के योहान्न गुटेनबर्ग (1398-1468) ने सन् 1440 ई. में ऐसे टाइपों का आविष्कार किया, जिनके माध्यम से पृथक् पृथक् सामग्री को बहुसंख्यक रूप से मुद्रित किया जा सकता था। गुटेनबर्ग ने ही सन् 1454-55 ई. में विश्व का प्रथम छापाखाना स्थापित किया एवं सन् 1456 में बायबल की 300 प्रतियों को प्रकाशित कर पेरिस भेजा। इस पुस्तक की मुद्रण-तिथि 14 अगस्त, 1456 ई. निर्धारित की गई है। गुटेनबर्ग के छापाखाने से एक बार में 600 प्रतियाँ तैयार की जा सकती थीं। परिणामतः 50-60 वर्षों के भीतर ही सम्पूर्ण यूरोप में करीब दो करोड़ पुस्तकें प्रकाशित हो गयी थीं। ‘लिपि' के जन्म के बाद भी ‘श्रुति' का महत्त्व यथावत् बना रहा। गुरु-शिष्य-परम्परा के पोषक पण्डितों के कण्ठ में वेद भगवान् विराजमान रहे। श्रुति की परम्परा अक्षुण्ण बनी रही। तभी तो विधर्मियों द्वारा तक्षशिला, नालन्दा, विक्रमशिला-जैसे ग्रन्थागारों के नष्ट किए जाने के बाद भी ज्ञान की परम्परा अवरुद्ध नहीं हुई। ऐसे ही विकट समय में किसी मनीषी ने पुस्तक की अपेक्षा कण्ठ में बसी विद्या को अधिक महत्त्व प्रदान करते हुए लिखा है- 

पुस्तकस्था तु या विद्या परहस्तगतं धनम्।
कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्धनम्॥

मनुष्य के जीवन में पुस्तकों का अप्रतिम महत्त्व है। वैज्ञानिक प्रगति के दौर में पुस्तकों का स्वरूप भी परिवर्तित हुआ है। भोजपत्र से प्रारम्भ हुई पुस्तक की यात्रा आज ‘ई-बुक' तक पहुँच चुकी है। सुविधा की दृष्टि से ई-बुक के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता। छोटी-सी हार्ड डिस्क में सहस्राधिक पुस्तकें समाहित हो जाती हैं। अनन्त काल से चली आ रही ज्ञान-परम्परा को पुस्तकों ने वहन किया है। आज भले ही ऋषियों के आश्रम सूने हो गये हैं, किन्तु पुस्तकों ने उनके उपदेशामृत का अक्षय कुम्भ सहेज रखा है। मानवता के विकास के लिए पुस्तकें सरस्वती की मूर्तविग्रह के समान हैं। पुस्तकें न केवल वर्तमान के अभ्युदय की साक्षी हैं, अपितु स्वर्णिम भविष्य को गढ़ती भी हैं।