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सुनहरा युग पुस्तकों का...
August 24, 2018 • Navlekha Team

पुस्तकें मनुष्य की सर्वाधिक अच्छी और विश्वसनीय मित्र हैं। दुनिया में मुद्रित पुस्तकों का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। सन् 1455 में जर्मनी के योहान्न गुटेनबर्ग द्वारा छापेखाने के आविष्कार के बाद दुनियाभर में आज की जैसी पुस्तकों का प्रचार-प्रसार हुआ। इसके ठीक सौ वर्ष बाद पुर्तगाल के जेसुएट-पादरियों द्वारा भारत में मुद्रण की तकनीक पहुँची और यहाँ भी किताबें छपनी शुरू हुईं। पुर्तगालियों ने गोवा में तथा अंग्रेजों ने सीरामपुर में छापेखाने खोलकर किताबें छापनी शुरू कीं। इस तरह भारत में मुद्रित पुस्तकों का इतिहास केवल साढ़े चार सौ वर्ष ही पुराना है।

लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं है कि अपने देश में पुस्तकें नहीं लिखी जाती थीं। भारत ने ही दुनिया को लिखना सिखाया था। एक समय यहाँ 64 प्रकार की लिपियाँ प्रचलित थीं। तालपत्र और भोजपत्र पर ग्रंथ हाथ से लिखे जाते थे और हाथ से ही उनकी प्रतिलिपि बनाई जाती थी। ऐसे ग्रंथों को ‘पाण्डुलिपि' कहा जाता है। कपास को कूटकर कागज़ भी बनाया जाता था। अनेक यूनानी इतिहासकारों ने भारत को कागज़ का जन्मदाता कहा है। आज भी देश में कुछ स्थानों पर इस विधि से काग़ज़ बनाया जा रहा है। हाथ से लिखने और उनकी प्रति बनाने में समय बहुत अधिक लगता था और इस कार्य में प्रक्षेपण की भी पूरी सम्भावना रहती थी। इस कठिनाई के होते हुए भी अपने यहाँ बड़ी संख्या में और बड़े-बड़े संस्कृत-ग्रंथ लिखे और ग्रन्थित किए गये। न केवल लिखे गए, बल्कि बड़े-बड़े पुस्तकालय बनाकर उनका भली-भाँति संरक्षण भी किया गया। आज भी अपने पास बड़ी संख्या में पुरानी पाण्डुलिपियाँ मौजूद हैं।

मुद्रण-कला के आविष्कार के बाद हाथ से लिखने और उनकी नकल उतारने के झंझट से छुटकारा मिला तथा किसी पुस्तक को कम समय में बड़े परिमाण में प्रकाशित करना सम्भव हुआ। इसमें कोई सन्देह नहीं कि यह कला पश्चिम में फली-फूली और पश्चिमवासियों के द्वारा यह प्रायः पूरी दुनिया में फैली। यद्यपि इसमें साम्राज्यवादी और मजहबी दृष्टिकोण प्रमुख था। अंग्रेजी शासनकाल में भारतवर्ष में अनेक प्रेस स्थापित हुए, जिनमें राष्ट्रवादी और धार्मिक- दोनों तरह की पुस्तकें बड़ी संख्या में छपींनवलकिशोर प्रेस (लखनऊ), खेमराज श्रीकृष्णदास श्रीवेंकटेश्वर स्टीम मुद्रणालय (बम्बई), निर्णयसागर प्रेस (बम्बई), गीताप्रेस (गोरखपुर), राजकीय मुद्रणालय (त्रिवेन्द्रम्), एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ बंगाल (कलकत्ता), जीवानन्द विद्यासागर (कलकत्ता), मोतीलाल बनारसीदास (लाहौर एवं पटना), आनन्दाश्रम मुद्रणालय (पूना), चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान (वाराणसी), विद्या विलास प्रेस (वाराणसी), खड्गविलास प्रेस (पटना)-जैसे प्रेस और प्रकाशकों का भारतीय ज्ञान-यात्रा में गौरवपूर्ण स्थान है।

मुद्रण-कला में लगातार परिष्कार होता आया है। लीथो, ट्रेडिल, ऑफसेट, वेब ऑफसेट से आगे बढ़ते हुए अब डिजिटल प्रिंटिंग मशीनें आ गई हैं जिनसे दिनों का काम घंटों में संपन्न हो जाता है। एक ही बार में बहुरंगी पुस्तकें छापना बेहद सरल हो गया है। समय के साथ मुद्रित पुस्तकें अब ‘डिजिटल' रूप में सामने आ रही हैं। पुरानी पुस्तकों को भी स्कैन कर-करके 'ई-बुक' बनाया जा रहा है। इस तकनीक से स्थान की भारी बचत अवश्य हो रही है, भेजने-मंगाने में भी सहूलियत है, लेकिन शोध और अध्ययन की दृष्टि से मुद्रित पुस्तकें ई-बुक पर आज भी हावी हैं। ई-बुक में छपी इबारतें मस्तिष्क में अधिक समय तक सुरक्षित नहीं रहतीं, उन्हें बार-बार देखना-पढ़ना पड़ता है। इसलिए ई-बुक के प्रचार के बाद मुद्रित पुस्तकों के पठन-पाठन में कमी भले ही आई हो, लेकिन लोकप्रियता में कमी नहीं आई है। हमारा तो मानना है कि मुद्रित पुस्तकों का अभी फ़िलहाल कोई विकल्प नहीं है। हाँ, मुद्रित पुस्तकें काग़ज़ से बनती हैं और काग़ज़ वृक्षों की छाल से, इसलिए भविष्य में काग़ज़-निर्माण की कोई अन्य प्रणाली विकसित किए जाने की आवश्यकता है।