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December 13, 2018 • Navlekha Team

अन्त में अभिलिखित है। गीता ब्रह्मविद्या और योगशास्त्र है। यहाँ योग से तात्पर्य वह योग नहीं है जो व्यायाम के रूप में आसन और प्राणायाम करवाता है। यहाँ योग का बहुत व्यापक अर्थ है। कुछ संकेत तो स्वयं गीता में ही उपलब्ध है- योगः कर्मसु कौशलम्, समत्वं योग उच्यते, योगो नष्टः परन्तप- ऐसी शतशः अभिव्यक्तियाँ ‘योग’ शब्द को अत्यन्त व्यापक अर्थ देती हैंसंस्कृत के शब्दकोशों में तो योग के शतशः अर्थ और तात्पर्य व्याख्यात मिल जाएँगे। सांख्य और योग । योग मानव जीवन को परम तत्त्व से जोड़नेवाली विद्याएँ बतानेवाला दर्शन रहा है। हमारे छहों दर्शन (इनके अतिरिक्त तीन नास्तिक दर्शन भी) ज्ञान के सभी आयामों की स्पष्ट व्याख्या करनेवाले शास्त्र हैं। इनमें सांख्य समस्त सृष्टि का विज्ञान है, योग सृष्टि का और उसके नियन्ता का भी ज्ञान देनेवाला विज्ञान माना जाता है। यह जानकर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि हमारे छह आस्तिक दर्शनों में भी तीन