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तरह-तरह की कठपुतलियाँ
August 27, 2018 • Navlekha Team

 

भारत में कठपुतली की प्राचीन परम्परा के स्रोत महाभारत में मिलते हैं। सिंधु-सभ्यता में भी कठपुतली के अवशेष मिलते हैं। ईसा से 2500 वर्ष पूर्व टेराकोटा के सिर और धड़ से अलग बारीक डोरियों से संचालित गुड़िया मिली है। इसके अतिरिक्त भरतमुनि-कृत नाट्यशास्त्र एवं संस्कृत-नाटकों में विद्यमान ‘सूत्रधार' नामक चरित्र में इसका मूल स्रोत माना जाता है, जिसका अर्थ सूत्र अर्थात् डोर को धारण करनेवाला है। प्रस्तुत लेख में हम कठपुतलियों के निर्माण और उनसे सम्बन्धित कुछ खेलों को खेलने की विधि दे रहे हैं। - सम्पादक

नाटक का कोई रूप लोगों के इतना समीप नहीं जितना पुतलियों का तमाशा। बच्चे, बूढ़े, जवान- सभी पुतलियों के इस अद्भुत संसार की ओर खिंचे चले आते हैं। हममें से शायद ही कोई ऐसा हो जिसने कठपुतली का तमाशा न देखा हो। गा-बजाकर, नाचकर, मजेदार बातों से कठपुतलियाँ हमारा मनोरंजन करती हैं। लोगों का ध्यान खींचने के लिए, खेल में रुचिकर ढंग से प्रस्तुत करने के लिए कठपुतली संचार का एक ताकतवर माध्यम है।

कोई संजीदा बात कहनी हो उसके लिए कठपुतली का प्रयोग ठीक नहीं रहेगा। लेकिन सफाई, स्वास्थ्य-संबंधी संदेश देना हो, किसी की ग़लती बतानी हो, किसी का मज़ाक उड़ाना हो, कोई संदेश दोहराना हो तो कठपतुली का प्रयोग किया जा सकता है। किसी शिक्षाप्रद या अहम् संदेश देनेवाली कहानी को सामने रखने के लिए कठपुतली अच्छा माध्यम है। कठपुतली के तमाशे में ढोलक, संगीत, शोरगुल की खास जगह होती है। इनके बिना कठपुतली का तमाशा अधूरा है और मज़ा भी कम हो जाता है।

तरह-तरह की कठपुतलियाँ

लिफाफे की कठपुतली

दस्ताना कठपुतली 

खेल की तैयारी

इसके लिए एक नाटकीय कहानी अच्छी रहती है जिसमें संदेश के अलावा उछल कूद, रोमांच, गाना-बजाना हो। भाषा बिल्कुल बोलचाल की होनी चाहिए। गाने सीधे-सादे तुकबंदी के हो सकते हैं। नाटक में पात्र जितने कम होंगे, खेल दिखाने में आसानी होगी। पात्र के हिसाब से कठपुतलियाँ तैयार कर लें।

तमाशे के लिए विशेष मंच चाहिए होता है। कठपुतली चलानेवाले को छिपने की ज़रूरत है। यदि खास मंच न हो तो चारपाई खड़ी करके, उस पर चादर डालकर मंच तैयार किया जा सकता है। ढोलक-मंजरबजानेवाले और गानेवाले मंच के सामने बायीं ओर बैठ जायें। मंच पर असली दृश्य दिखाने के लिए घर, कमरा, चौका-चूल्हा, मेज-कुर्सी, अलमारी आदि की ज़रूरत हो सकती है। इनका खाका बनाकर चार्ट तैयार किया जा सकता है।

नाटक और मंच तैयार कर जगह चुनें। लोगों को स्थान और समय की सूचना पहले से देनी होगी। जब सभी इकट्ठा हो जायें, तो खेल शुरू करें। पहले थोड़ा गाना-बजाना भी हो सकता है। खेल में जरूरी बातों को दोहराया जा सकता है, मगर आकर्षक ढंग से। पात्र को साफ़ और ऊँचा बोलना चाहिए। खेल के दौरान पात्र देखनेवालों से सवाल पूछे तो अच्छा लगता है। इससे दर्शक अपने को खेल का भाग समझने लगते हैं। खेल की सफलता के लिए यह अच्छा है। खेल में एक सूत्रधार हो जो मनोरंजन के साथ-साथ संदेश और दर्शकों से संबंध बना सकता है। खेल इतना लंबा न हो कि लोग ऊब जाएं। बार-बार पर्दा उठाना-गिराना उबाऊ होता है।

अंत में, खेल के बाद दर्शकों के साथ बातचीत ज़रूरी है। उससे पता चलेगा कि आप उन तक अपनी बात पहुँचा सके हैं या नहीं। इस तरह आगे धरे-धीरे खेल में सुझावों के अनुसार सुधार भी किए जा सकते हैं। खेल की चर्चा में दर्शकगणों की भी रुचि रहती है।

दी कोर प्रतिनिधि