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स्वास्थ्य एवं स्वाद का अद्भुत संगम भारतीय मसाले
August 25, 2018 • Navlekha Team

भारत में मसालों का प्रयोग सदियों से होता आ रहा है। खाने में रंगों की विविधता एवं लजीज़ स्वाद का संगम इन मसालों की ही देन है। ईसा पूर्व 330 का इतिहास इनकी खोज का इतिहास है जब सिकंदर के विश्वप्रयाण के एवज़ में इन मसालों के बारे में दुनिया को पता चला।

भारतीय आयुर्वेद के महान् व्याख्याता महर्षि चरक ने 3000 वर्ष पूर्व लहसुन की उपादेयता हृदय के टॉनिक के रूप में बता दी थी तथा यह बताया था कि यह खून को पतला बनाने में कारगर है। 2500 वर्ष पूर्व चीन के महान् दार्शनिक कनफ्यूशियस ने हर खाने में अदरख लेने को कहा था क्योंकि अदरख से पाचन-क्रिया में मदद मिलती है। इतिहासकारों ने उल्लेख किया है कि भारतीय मसालों की यूरोप में धूम थी। ये मसाले न केवल भोजन को स्वादिष्ट बनाते थे बल्कि भोजन को जल्दी सड़न से बचाकर उसे अधिक टिकाऊ भी बनाते थे।

आज भारत विश्व में मसालों का सबसे बड़ा उत्पादक, उपभोक्ता और निर्यातक है। हाल के दिनों में वैज्ञानिक धरातल पर आधुनिक अनुसंधानों एवं अन्वेषणों ने भारतीय मसालों को स्वास्थ्य के लिए बहुत ही मुफीद माना है। सबसे अच्छी बात यह है कि उनका उपयोग काफ़ी कम मात्रा में होता है और इनका इसका खर्च बहुत ही कम है। यानी कम खर्च में, अच्छे स्वाद एवं अच्छी सुगंध के साथ मसालों के उचित उपयोग से हम अपनी सेहत बुलंद रख सकते हैं तथा मधुमेह, हृदय-रोग एवं कैंसर-जैसी भयंकर बीमारियों से अपने शारीरिक किले को महफूज़ रख सकते हैं।

भारत में उगाए जानेवाले 75 मसालों की लंबी सूची है, परंतु मिर्च, कालीमिर्च, अदरक, हल्दी, इलायची, लौंग, जायफल, धनिया, केसर और जीरा व्यावसायिक रूप से अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। यहाँ हम बराबर इस्तेमाल में आनेवाले कुछ सामान्य मसालों के खूबसूरत पन्नों पर प्रकाश डालेंगे ताकि आनेवाले दिनों में हम, लोगों में यह चेतना जागृत कर सकें कि मसालेदार खाने का मतलब हमेशा खतरनाक नहीं होता। कम मात्रा में उचित मसालों का प्रयोग हमारे व्यावहारिक जीवन को खुशनुमा एवं सेहतमंद बना सकता है। उदाहरणार्थ :

हल्दी

यह एक पौधा कुरकुमा लौंगा के जड़ से निकाला जाता है। इसके फ़ायदे की श्रृंखला बड़ी लम्बी है। फेहरिस्त पर गौर करें, तो पायेंगे कि यह एक ऐंटी-ऑक्सिडेंट (ऑक्सीकरण निरोधक) है। उत्तेजना अवरोधक (ऐंटी इन्फ्लामेंटरी) होने की वजह से हृदय की बीमारियाँ तथा अल्जाइमर रोग से बचाने की क्षमता है। इसमें घावों को सुखाने की ज़बरदस्त ताकत है। इसे चेहरे पर या चमड़े पर लगाने से सौंदर्य को बढ़ाने की कोशिश वर्षों से होती आई है। यह खून में कोलेस्ट्रॉल तथा एल.डी.एल. (लो-डेन्सिटी लाइपोप्रोटीन) को कम करता है और हृदय के आघात से बचाता है। जोड़ों के दर्द से निजात दिलाने में इसकी महती भूमिका है।

हल्दी के अर्क में जो आंतरिक तत्त्व होते हैं, उन्हें करकुमिन कहा जाता है। करकुमिन की उपदेयता कैंसर के बचाव में भी है। क्योंकि कैंसर के कोशिकाओं की वृद्धि को रोक पाने में यह सक्षम है। इसलिए एक सच्चाई यह है कि कैंसर के बचाव में हल्दी की एक अहम भूमिका है। हल्दी के करकुमिन में मोतियाबिंद को रोकने की अपूर्व क्षमता है। एक अनुसंधान ने स्पष्ट किया है कि हल्दी मोतियाबिंद की वृद्धि की गति को काफी कम कर देता है। इसलिए हल्दी हमारे अच्छे स्वास्थ्य की एक सफल कुंजी है। इसका उचित मात्रा में प्रयोग निरोग रहने हेतु आवश्यक है।

हल्दी के विशेष गुणों पर शोध जारी है। जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च के तपस कुन्दू, इण्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एवं राजीव गाँधी सेन्टर फॉर बायोटेक्नोलॉजी, तिरुअनन्तपुरम् के डी. करुणाकरण द्वारा शोध के जो नतीजे आए हैं, उसके अनुसार हल्दी एड्स के एचआईवी वाइरस की प्रजनन-शक्ति को अवरुद्ध करता है और उस प्रकार के मलेरिया के कीटाणु के विरुद्ध मानव शरीर में मारक शक्ति पैदा करता है, जिस पर दवाओं का असर नहीं होता। यह गर्भाशय मुख (सरभिक्स), आमाशय, बड़ी आंत, स्तन और मुँह के कैंसर, गठिया, अल्जाइमर रोग (जिसमें मानसिक शक्ति का बहुत ज्यादा ह्रास हो जाता है) में भी लाभदायक है।

अदरख

इसे वैज्ञानिक भाषा में जिंजिबरऑफीसियनेल कहा जाता है। इसका सक्रिय तत्त्व जिंजेरोल होता है जो खून की धमनियों को फैलाता है तथा खून के संचार की गति को बढ़ाता है। फलस्वरूप शरीर में होनेवाले दर्द को भी कम करता है। यह ऐंटिमाइक्रोबियल यानी जीवाणु से लड़नेवाले तथा ऐंटिथ्रौम्बोटिक यानी खून के थक्का को नहीं बनने देनेवाले गुणों से भरपूर है। हृदय-रोगों से बचाव तथा कैंसर से बचाव करता है। संक्षेप में, यह एक सामान्य-सा दीखनेवाला, सस्ता मसाला आनेवाली खतरनाक बीमारियों, जैसे कैंसर तक को आपके शरीर से दूर रख सकता है। अल्जाइमर रोग यानी बुढ़ापे में विस्मरण की बीमारी तथा घुटने में दर्द पैदा करनेवाली ऑस्टियो आर्थराइटिस की चिकित्सा में इसे वैज्ञानिक मान्यता मिल चुकी है।

काली मिर्च (ब्लैक पेप्पर)

इसे मसालों का राजा कहा जाता है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय पैमाने पर इस मसाले का भरपूर व्यावसायिक दोहन हुआ है। आज सिर्फ भारत में ही नहीं, विश्व के कई हिस्सों में काली मिर्च का सेवन हो रहा है। काली मिर्च भोजन के पचने में सहायक है। आजकल कई लोग पेट के गैस से परेशान दीखते हैं। इसकी चिकित्सा में इसका एक अहम योगदान है क्योंकि यह पेट में गैस को कम करता है। यदि शरीर के कटे हुए हिस्से में खून का रक्तस्राव लगातार जारी हो तो इसके स्थानीय इस्तेमाल यानी कटे स्थान पर लगाने से रक्त-स्राव रोका जा सकता है। यह ऐंटी-ऑक्सिडेंट भी है और मधुमेह (डायबीटिज) एवं हृदय-रोगों से बचाव में भी कारगर है।

दालचीनी

यह श्रीलंका में पेड़ की छाल से निकाला जाता है। आधुनिक अनुसंधानों ने यह स्पष्ट किया है कि यह 'बी' लिम्फोसाइट नामक रक्त-कोशिकाओं को उत्तेजित करता है तथा इन्सुलीन की मात्रा बढ़ाता है। इसलिए टाइप-2 मधुमेह के इलाज में भी इसका प्रयोग लाभकारी है तथा इससे बचाव में भी सहायक है। यह कोलेस्ट्रॉल तथा एल.डी.एल. घटाता है इसलिए हृदय की बीमारियों से भी मुक्ति का एक साधन है। कैंसर की कोशिकाओं को बढ़ने से रोकता है यानी कैंसर-निरोधक क्षमता इमसें समाहित है। गठिया की बीमारी में कराहते हुए दर्द का भी यह निवारण करता है।

हींग

हींग का सेवन सांस की बीमारियों, खासकर कुकुर-खाँसी, दमा तथा ब्रोंकाइटिस में लाभकारी पाया गया है। औरतों में बांझपन, अनचाहा गर्भपात तथा कष्टप्रद माहवारी में भी हींग का सेवन श्रेयस्कर है। मर्दो में नपुंसकता में यह प्रभावशाली है। पेट में ज्यादा गैस एवं बदहजमी में हींग पुराने समय से एक ओषधि के रूप में इस्तेमाल होता आया है।

लौंग

लौंग का सेवन दाँत के दर्द में सदियों से होता आया है लेकिन इसकी गुणकारी क्षमता कहीं ज्यादा है। इसमें बैक्टीरिया, वायरस व फंगस के विरुद्ध मारक शक्ति है। पेट के गैस एवं बदहजमी में भी यह कारगर है। मर्दो में सामान्य बीमारी, जैसे वीर्य के शीघ्रपतन में भी इसका प्रभाव देखा गया है।

धनिया

धनिया की चटनी, खाने में इतना लजीज कि, भूख दुगुनी हो जाए। विशेष गौर करें कि धनिया मधुमेह में चीनी की मात्रा कम करता है। साथ-साथ ट्राईग्लिसराइड कोलेस्ट्रॉल तथा एल.डी.एल. की मात्रा कम करके हृदय-रोगों के विस्तार पर भी अंकुश लगाता है। साथ-साथ यह प्लेटलेड-विरोधी भी है।

इलायची

आज हर घरों में कहीं-न-कहीं पार्टियों में, भोजन के साथ इलायची सामान्यतया प्रयोग में आता है। यह पेट में गैस, जलन को कम करता है तथा मुँह के सांसों को स्वच्छ रखने में सहायक है। साथ-साथ कैंसर के बचाव में भी इसकी अहम भूमिका है। लहसुन और प्याज मसालों के स्वाद को बढ़ाते हैं, साथ-साथ कई अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार रोजाना 100 ग्राम प्याज या 3 ग्राम लहसुन (पकाई गई सब्जी में इसे पीसकर डालने से) खाने से रक्त में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा में कमी आती है। इसलिए यह स्पष्ट है। कि इन सामान्य मसालों में गुणों का असीमित भण्डार है जिसके सही उपयोग से हम व्यञ्जनों के अपूर्व रसास्वादन के साथ अच्छी सेहत का भी लाभ ले सकते हैं।