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प्रचलित भारतीय शिक्षापद्धति की विसंगतियाँ
August 25, 2018 • Navlekha Team

 उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारतीय शिक्षा की क्या स्थिति थी और शिक्षा प्रदान करने की क्या प्रक्रिया थी, शिक्षा-तंत्र कैसे संचालित होता था - इस पर इण्डिया ऑफिस लन्दन में रखे हुए, अंग्रेजों द्वारा लिखित दस्तावेज, प्रत्येक भारतीय को, जो शिक्षा के प्रति समर्पित है, अवश्य देखना चाहिये।

पर आधुनिक भारत के शिक्षाविदों ने इन तथ्यों को संज्ञान में न लेकर, काँग्रेस-कम्युनिस्टों और उनके द्वारा शिक्षा-संस्थानों में बिकी हुई आत्माओं के शिक्षाविदों ने वह कार्य कर दिखाया जो मैकाले के मानस पुत्र- अंग्रेज़ शिक्षा प्रदाता भी न कर सके थे। इन तथाकथित विद्वानों ने यह झूठा, भ्रामक, द्वेषपूर्ण प्रचार, कि परम्परागत भारतीय शिक्षा मात्र द्विजों तक ही सीमित थी। यह तथ्य साक्ष्यों के पूर्ण विपरीत है। ब्रिटिश दस्तावेज इस बात के प्रमाण हैं कि 18वीं शताब्दी के अन्त तक भारत में जो शिक्षा प्रचलित थी, वह समकालीन इंग्लैण्ड की शिक्षा की दशा से बहुत आगे थी। भारत के प्रत्येक ग्राम में एक पाठशाला होती थी जिसमें सभी वर्ग, जाति के बालक-बालिकाएँ शिक्षा प्राप्त करते थे। उच्च शिक्षा की विशेषज्ञता में विशिष्टताएँ थीं जो समूहगत थीं। बड़े ग्रामों में एक से अधिक पाठशालाएँ होती थीं और नगर में अनेक।

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में वेदों, शास्त्रों, महाकाव्यों सहित जिन-जिन ग्रंथों का अध्ययन-अध्यापन किया जाता था, इसके साक्षी ब्रिटिश दस्तावेज हैं। गणित, खगोलशास्त्र (भूगोल), अनेक प्रकार के शिल्पों, आयुर्वेद से उन्नत ज्ञान का आदान-प्रदान उस शिक्षा में भारतीय परिप्रेक्ष्य में सहज रूप से होता था। इस शिक्षा-पद्धति को प्रयासपूर्वक अंग्रेजों ने समाप्त करने की चेष्टा की, परन्तु यह शिक्षा-व्यवस्था आधे भारतवर्ष में 1947 के अंत तक चलती रही। हम सभी की शिक्षा का प्रारम्भ इसी परिवेश में हुआ था। 

परम्परागत इस शिक्षा के विनाश का कार्य 1947 ई. के बाद कम्युनिस्टों-सेक्युलरिस्टों-नास्तिकों के एक समुदाय, जिसे राजतंत्र का समर्थन था, द्वारा प्रारम्भ किया गया। इनका उद्देश्य एक नास्तिक भौतिकवादी समुदाय को विकसितकर बहुसंख्यक हिंदुओं को मानसिक दास बनाकर उनकी मानसिकता को नियंत्रित और परिवर्तित करना था। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अल्पसंख्यकों, ईसाइयों के शिक्षा-संस्थानों को राजकोष से धन देकर पोषित करने तथा उन्हें संरक्षण देने का कुत्सित प्रयास, इस तथ्य की अनदेखी कर, कि अल्पसंख्यकों का दर्जा संविधान में किस प्रतिशत तक होना चाहिए था, उन्हें प्रत्येक प्रकार के समर्थन देने का अभियान-सा चला दिया गया। यह कृत्य लोकतंत्र की भावना के विरुद्ध है। इस प्रकार की शिक्षा का परिणाम यह हुआ कि 1 बहुसंख्यक भारतीयों को दर्शन, धर्मशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, न्यायशास्त्र, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, विज्ञान, अर्थशास्त्र, इतिहास, भूगोल, साहित्य तथा कलाओं के क्षेत्र में भारतीय ज्ञान-परम्पराओं से पूर्णतः वंचित कर दिया गया। इस प्रकार निन्दनीय प्रयास, संसार में अपनी इस शिक्षा की धृतराष्ट बुद्धि की अनोखी मिसाल है। जिसमें नास्तिकों-कम्युनिस्टों द्वारा संपादित सामग्री छात्रों को पढ़ाई जाने लगी। यह सर्वविदित है कि इनके द्वारा लिखे गए भारतीय शिक्षा के जिस इतिहास को पढ़ाया जाता है,वह झूठ और मिथ्या तथ्यों से भरा-पूरा है। वह झूठ और मिथ्या तथ्यों से भरा-पूरा है।

इन पुस्तकों में अनादि काल से चली आ रही शिक्षा को दस-पाँच पृष्ठों में गलत ढंग से समेट दिया गया है और एंग्लोइण्डियन शिक्षा को, जो मात्र 90 वर्ष पुरानी है, गौरवान्वित किया गया है। इस प्रकार के असत्य का प्रचार निन्दनीय है। उसी प्रकार मैकाले की शिक्षा से प्रेरणाप्राप्त शिक्षाविदों और नौकरशाहों द्वारा भारत सरकार द्वारा गठित विविध शिक्षा-आयोगों पर समग्रता से न विचार करने की प्रवृत्ति भी। इन पुस्तकों में अनादि काल से चली आ रही शिक्षा को दस-पाँच पृष्ठों में गलत ढंग से समेट दिया गया है और एंग्लोइण्डियन शिक्षा को, जो मात्र 90 वर्ष पुरानी है, गौरवान्वित किया गया है। इस प्रकार के असत्य का प्रचार निन्दनीय है। उसी प्रकार मैकाले की शिक्षा से प्रेरणाप्राप्त शिक्षाविदों और नौकरशाहों द्वारा भारत सरकार द्वारा गठित विविध शिक्षा-आयोगों पर समग्रता से न विचार करने की प्रवृत्ति भी।

सन् 1947 तक भारत में कुल 14 विश्वविद्यालय थे जिनमें 2 लाख की संख्या में छात्रगण थे। वर्तमान भारत में विश्वविद्यालयी शिक्षा ग्रहण करनेवाले छात्रों की संख्या लगभग 2 करोड़ है जो स्वतंत्रताप्राप्ति की छात्र-संख्या की तुलना में 100 गुनी अधिक है। यहाँ पर भारत की जनसंख्या-वृद्धि, जो एक अनुमान से 4 गुना बढ़ी है, परन्तु छात्र-संख्या में इससे 12- 13 गुना बढ़ोत्तरी भारत को युवाओं का देश तो बना रही है, पर आज की भारतीय शिक्षा वाञ्छित गुणवत्तायुक्त है ? क्या इस प्रकार की भारतीय उच्च शिक्षा में भारतीय ज्ञान- परम्परा के पठन-पाठन की महत्ता पर किसी ने दृष्टिपात किया है ? यही कारण है कि आज तक हमारे विश्वविद्यालयों से एक भी दार्शनिक, राजनीतिशास्त्री और समाजवैज्ञानिक नहीं निकले और न उनके कोई ख्यातिप्राप्त ग्रंथ ही समाज को मिल सके जो समाज और व्यक्ति के लिए प्रेरणा- स्रोत बन सकें। सन् 1947 तक भारत में कुल 14 विश्वविद्यालय थे जिनमें 2 लाख की संख्या में छात्रगण थे। वर्तमान भारत में विश्वविद्यालयी शिक्षा ग्रहण करनेवाले छात्रों की संख्या लगभग 2 करोड़ है जो स्वतंत्रताप्राप्ति की छात्र-संख्या की तुलना में 100 गुनी अधिक है। यहाँ पर भारत की जनसंख्या-वृद्धि, जो एक अनुमान से 4 गुना बढ़ी है, परन्तु छात्र-संख्या में इससे 12- 13 गुना बढ़ोत्तरी भारत को युवाओं का देश तो बना रही है, पर आज की भारतीय शिक्षा वाञ्छित गुणवत्तायुक्त है ? क्या इस प्रकार की भारतीय उच्च शिक्षा में भारतीय ज्ञान- परम्परा के पठन-पाठन की महत्ता पर किसी ने दृष्टिपात किया है ? यही कारण है कि आज तक हमारे विश्वविद्यालयों से एक भी दार्शनिक, राजनीतिशास्त्री और समाजवैज्ञानिक नहीं निकले और न उनके कोई ख्यातिप्राप्त ग्रंथ ही समाज को मिल सके जो समाज और व्यक्ति के लिए प्रेरणा- स्रोत बन सकें।

एक और विचारणीय बिन्दु- क्या मात्र विश्वविद्यालयों में विद्वान् शिक्षा देते हैं ? क्या विश्वविद्यालयों के बाहर विद्वान् नहीं हैं? इस प्रकार की सोच ने हमारी चिन्तन- परम्परा को प्रभावित किया है और उन तपोनिष्ठ विद्वानों की उपेक्षा की है जिन्होंने भारतीय सन्दर्भो का सम्बल लेकर, प्रमाण देकर महत्त्वपूर्ण लेखन-कार्य किया है। आज कितने लोग सर्वश्री विनायक दामोदर सावरकर, भगवद्दत्त, युधिष्ठिर मीमांसक, चन्द्रगुप्त विद्यालंकार, चिन्तामणि विनायक वैद्य, जयचन्द्र विद्यालंकार, सत्यकेतु विद्यालंकार, रघुनाथ सिंह, वासुदेवशरण अग्रवाल, गौरीशंकर हीराचन्द ओझा आदि अनेक विद्वान् हैं जिनकी कृतियों की कोई चर्चा विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रमों में नहीं होती एक और विचारणीय बिन्दु- क्या मात्र विश्वविद्यालयों में विद्वान् शिक्षा देते हैं ? क्या विश्वविद्यालयों के बाहर विद्वान् नहीं हैं? इस प्रकार की सोच ने हमारी चिन्तन- परम्परा को प्रभावित किया है और उन तपोनिष्ठ विद्वानों की उपेक्षा की है जिन्होंने भारतीय सन्दर्भो का सम्बल लेकर, प्रमाण देकर महत्त्वपूर्ण लेखन-कार्य किया है। आज कितने लोग सर्वश्री विनायक दामोदर सावरकर, भगवद्दत्त, युधिष्ठिर मीमांसक, चन्द्रगुप्त विद्यालंकार, चिन्तामणि विनायक वैद्य, जयचन्द्र विद्यालंकार, सत्यकेतु विद्यालंकार, रघुनाथ सिंह, वासुदेवशरण अग्रवाल, गौरीशंकर हीराचन्द ओझा आदि अनेक विद्वान् हैं जिनकी कृतियों की कोई चर्चा विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रमों में नहीं होती है। कारण स्वतः स्पष्ट है। इस प्रकार की प्रगतिशील विचारधारा, जिनमें वे सभी हैं जिन्हें भारतीय संस्कृति कटु, तिक्त लगती है, के पोषक जबतक मैकालयी प्रभाव का आवरण धारणकर शिक्षा-जगत् में विद्यमान रहेंगे, तबतक हम शिक्षा-क्षेत्र में मात्र नौकर उत्पन्न करते चले जायेंगे; दार्शनिक, नीतिवान् और विचारकों को कभी भी, इन शिक्षा-केन्द्रों से उत्पन्न नहीं कर सकते।

भारतीय शिक्षा की शास्त्रविमुखता को बढ़ाने में हमारी भाषा-नीति ही अधिकांशतः ज़िम्मेदार रही है। भारतीय शास्त्र, चाहे वे आयुर्वेद, योग, शिल्प अथवा विज्ञान-कला के क्षेत्र के क्यों न हों, को उचित रूप से समझने के लिए सर्वभाषाओं की जननी संस्कृत का शिक्षण आवश्यक है। यह भाषा ही भारत की आत्मा है। इतना ही नहीं, संस्कृत वह भाषा है जिसे कंप्यूटर के लिए सर्वोपयुक्त माना गया है। यदि कोई इसके तथ्य पर उंगली उठाता है, तो वह अपनी विज्ञानसम्मत सोच की हँसी उड़ाता है। संस्कृत वह भाषा है, जिसका व्याकरण, शब्द-विन्यास आज तक अक्षुण्ण है, अपरिवर्तित है, बदला नहीं है। संस्कृत का अध्ययन करनेवाला कोई भी व्यक्ति हज़ारों साल पहले लिखे गए वाङ्य को बिना कठिनाई के समझ सकता है, अध्ययन कर सकता है। ठीक इसके विपरीत अंग्रेजी जाननेवाला 400 वर्ष पहले लिखे गए अंग्रेजी पाठ को समझने में माथा ठोक लेगा। भारतीय शिक्षा की शास्त्रविमुखता को बढ़ाने में हमारी भाषा-नीति ही अधिकांशतः ज़िम्मेदार रही है। भारतीय शास्त्र, चाहे वे आयुर्वेद, योग, शिल्प अथवा विज्ञान-कला के क्षेत्र के क्यों न हों, को उचित रूप से समझने के लिए सर्वभाषाओं की जननी संस्कृत का शिक्षण आवश्यक है। यह भाषा ही भारत की आत्मा है। इतना ही नहीं, संस्कृत वह भाषा है जिसे कंप्यूटर के लिए सर्वोपयुक्त माना गया है। यदि कोई इसके तथ्य पर उंगली उठाता है, तो वह अपनी विज्ञानसम्मत सोच की हँसी उड़ाता है। संस्कृत वह भाषा है, जिसका व्याकरण, शब्द-विन्यास आज तक अक्षुण्ण है, अपरिवर्तित है, बदला नहीं है। संस्कृत का अध्ययन करनेवाला कोई भी व्यक्ति हज़ारों साल पहले लिखे गए वाङ्य को बिना कठिनाई के समझ सकता है, अध्ययन कर सकता है। ठीक इसके विपरीत अंग्रेजी जाननेवाला 400 वर्ष पहले लिखे गए अंग्रेजी पाठ को समझने में माथा ठोक लेगा। यह वर्ग इसको आधुनिकता जोड़ेगा और संस्कृत को 'डेड लैंग्वेज़' कहकर मुदित होगा। पर सोचिए कि यूरोप का कोई व्यक्ति यह वर्ग इसको आधुनिकता जोड़ेगा और संस्कृत को 'डेड लैंग्वेज़' कहकर मुदित होगा। पर सोचिए कि यूरोप का कोई व्यक्ति बिना लैटिन, ग्रीक भाषाओं से परिचय प्राप्त किए प्रसिद्ध वैज्ञानिक, इंजीनियर, विचारक बन सका है ? मैंने स्वतः यूरोप की जिन प्रयोगशालाओं में शोध-कार्य किया, वहाँ के सभी प्रोफेसर इन भाषाओं से परिचित थे। जैसे बिना रामायण, महाभारत, अर्थशास्त्र और नीतिशास्त्रों का अध्ययन किए बिना भारत को समझना कठिन है। इसी कारण हमें छात्रों को संस्कृत, पाली, प्राकृत, तमिल आदि भाषाओं को पढ़ाना आवश्यक है। यह उसी समय सम्भव होगा जब भारत के शिक्षाविद् इस विचार को सम्मानित करें और भाषा-नीति में परिवर्तन करें। बिना लैटिन, ग्रीक भाषाओं से परिचय प्राप्त किए प्रसिद्ध वैज्ञानिक, इंजीनियर, विचारक बन सका है ? मैंने स्वतः यूरोप की जिन प्रयोगशालाओं में शोध-कार्य किया, वहाँ के सभी प्रोफेसर इन भाषाओं से परिचित थे। जैसे बिना रामायण, महाभारत, अर्थशास्त्र और नीतिशास्त्रों का अध्ययन किए बिना भारत को समझना कठिन है। इसी कारण हमें छात्रों को संस्कृत, पाली, प्राकृत, तमिल आदि भाषाओं को पढ़ाना आवश्यक है। यह उसी समय सम्भव होगा जब भारत के शिक्षाविद् इस विचार को सम्मानित करें और भाषा-नीति में परिवर्तन करें।

एक और प्रश्न। प्रारम्भिक शिक्षा में शिक्षण का माध्यम क्या हो? आप मुझे किसी देश का नाम बताइए जिसने बिना अपनी मातृभाषा को प्रारम्भिक शिक्षाओं में पढ़ाए, विकास किया हो। भारत में, जो आज प्रारम्भिक शिक्षा में अंग्रेज़ी की विसंगति है, वह इन छात्रों को भारत से कभी भी नहीं जोड़ सकती। यह भारत को इण्डिया और भारतवर्ष में बाँट रही है। हमारो राष्ट्रीय विकास के चिन्तकों, भाषानीति बनानेवालों को इस बिन्दु पर गम्भीरता से विचार करना चाहिये। एक और प्रश्न। प्रारम्भिक शिक्षा में शिक्षण का माध्यम क्या हो? आप मुझे किसी देश का नाम बताइए जिसने बिना अपनी मातृभाषा को प्रारम्भिक शिक्षाओं में पढ़ाए, विकास किया हो। भारत में, जो आज प्रारम्भिक शिक्षा में अंग्रेज़ी की विसंगति है, वह इन छात्रों को भारत से कभी भी नहीं जोड़ सकती। यह भारत को इण्डिया और भारतवर्ष में बाँट रही है। हमारो राष्ट्रीय विकास के चिन्तकों, भाषानीति बनानेवालों को इस बिन्दु पर गम्भीरता से विचार करना चाहिये।

इसी सन्दर्भ में मैं आज नकल कर पास होनेवाले और शिक्षा के व्यापारीकरण का प्रश्न भी उठाना चाहूँगा। इस सुरसा के मुख के समान विकराल समस्या का तत्काल निराकरण आवश्यक है। अन्यथा समाज डिग्रीधारी अशिक्षितों से भर जायेगा, उस समय इस नकल-प्रथा का निर्मूलन करना कठिन हो जायेगा।। इसी सन्दर्भ में मैं आज नकल कर पास होनेवाले और शिक्षा के व्यापारीकरण का प्रश्न भी उठाना चाहूँगा। इस सुरसा के मुख के समान विकराल समस्या का तत्काल निराकरण आवश्यक है। अन्यथा समाज डिग्रीधारी अशिक्षितों से भर जायेगा, उस समय इस नकल-प्रथा का निर्मूलन करना कठिन हो जायेगा।।