Navlekha.page
डाक से ई-मेल तक का सफर
August 25, 2018 • Navlekha Team

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह अपने परिजनों, मित्रों, शुभचिन्तकों अपने परिजनों, मित्रों, शुभचिन्तकों और रिश्तेदारों के आस-पास या या लगातार संपर्क में बने रहना चाहता है। इनसे दूर हो जाने होने पर वह बेचैनी तथा असुरक्षा महसूस करता है। मनुष्य दूसरे के हर क्रियाकलाप की जानकारी बिना देर लगाए पाना चाहता है, तथा अपवाद को छोड़कर अपनी बातें भी अन्य लोगों से साझा करना चाहता है। नित्यप्रति एक दूसरे का हाल-चाल लेने एवं दुःख-सुख में शामिल होने का प्रचलन इन्हीं कारणों से है। नौकरी, व्यापार एवं विभिन्न अन्य कारणों से व्यक्ति को अपने सगे-संबंधियों एवं शुभचिन्तकों को छोड़कर घर से दूर जाना पड़ता है। इन परिस्थितियों में वह किसी-न-किसी तरीके से उनके संपर्क में बने रहना चाहता है।

अपनी बात कहने तथा दूसरे की सुनने के लिए मनुष्य आपसी बातचीत, चौपाल, सभा, समारोह, गोष्ठियाँ, चिट्ठी, संदेश, संकेत, विभिन्न प्रकार की चर्चाएँ आदि खबरों के पुराने माध्यमों द्वारा तथा इनके साथ-ही-साथ टीवी, अखबार, रेडियो, टेलीग्राम, टेलीफोन, मोबाइल, फेसबुक, व्हाट्सएप, चैटिंग, मैसेजिंग, ई-मेल, ट्विटर-जैसी आधुनिक सुविधाओं का सहारा लेता है।

अठारहवीं शती से पहले की बात करें, तो दूर रह रहे रिश्तेदारों या घर से दूर गए किसी सदस्य का हाल-चाल जानने या संदेश लेने-देने के लिए किसी संदेशवाहक को भेजना पड़ता था। राजकीय संदेशों को दूत द्वारा भेजा जाता था। धनी एवं राजकीय व्यवस्था से जुड़े लोग तो अपने संदेशों को किसी प्रकार भिजवा देते थे, परंतु आम जनता के लिए यह बहुत ही मुश्किल तथा महंगा था। राजा/शासन/सरकार या किसी सामाजिक समूह की तरफ़ से संदेशों को लाने-ले जाने की कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं थी। विदेशों में डाक लाने, ले-जाने की दूर-दूर तक कोई व्यवस्था नहीं थी।

सन् 1700 एवं 1800 के कालखण्ड में, जब यूरोपवासी विश्व के अन्य देशों में व्यापार एवं शासन करने की इच्छा से रहने लगे, तब उन्हें महसूस हुआ कि सुदूर देशों में बेहतर एवं स्थायी शासन करने के लिए संदेशों को तेज गति से भेजना एवं प्राप्त करना बहुत ही आवश्यक है। विभिन्न देशों के मूल निवासियों द्वारा उनके विरुद्ध किए जानेवाले आंदोलनों एवं गुप्त प्रतिरोध को जल्द-से-जल्द जानने एवं समझने के लिए तो यह और भी ज़रूरी था। इसके साथ ही हजारों किलोमीटर दूर रह रहे परिजनों के हाल-चाल को निरंतर कुछ अंतराल पर तथा बिना ज्यादा समय गुजारे जानना ज़रूरी लगता था। इस ज़माने में संदेशों के आदान-प्रदान की व्यवस्था विश्वसनीय नहीं थी। घर से दूर जाते समय लोग रूआँसे हो जाते थे, क्योंकि सुख- दुःख का कोई भी संदेश जानेवाले तक पहुँच पाएगा या नहीं, या यदि पहुँचा तो कब पहुँचेगा, इसका निश्चित पता नहीं होता था।

इन्हीं आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए डाक विभाग खोला गया। सर्वप्रथम देश की राजधानी तथा बड़े शहरों में डाकघर स्थापित किए गए, फिर अन्य शहरों तथा कस्बों में। बाद में सभी महत्त्वपूर्ण गाँवों में डाकघर स्थापित किए गए। डाकघरों से पत्रों, किताबों के साथ-साथ धन का आदान-प्रदान भी किया जा सकता था। प्रत्येक डाकघर में पोस्टमास्टर तथा पत्र पहुँचाने के लिए डाकियों की नियुक्तियाँ की गयीं। पोस्टऑफिस के कर्मचारियों को, गोपनीय रूप से निगरानी के तंत्र के रूप में भी प्रयोग किया गया। एक समय डाकिया। ग्रामीण जनमानस के बीच मेहमान सरीखे सम्मान एवं प्रतीक्षा का विषय रहता था और कुछ क्षेत्रों में आज भी है। दूरी के हिसाब से डाक 1 सप्ताह से 2 महीने तक का समय लेते हुए गंतव्य तक पहुँचती थी। कभी-कभी डाक गुम भी हो जाती थी या बहुत समय बाद पहुँचती थी। इन कारणों से विश्व के विभिन्न देशों में डाक लाने, ले-जाने की तेज विधि की आवश्यकता महसूस की जा रही थी।

 

सन 1800 में वोल्ट (17451827) नामक इतालवी वैज्ञानिक ने तथा सन् 1836 में ब्रिटिश वैज्ञानिक डेनियल (1790-1845) ने विद्युत-सेल का आविष्कार किया, इनसे डाक-व्यवस्था में बदलाव का युग प्रारम्भ हुआ। वैज्ञानिक सैमुएल एफ.बी. मोर्स (1791-1872) ने विद्युत-शक्ति से संचालित टेलीग्राम की खोज कर तारों में विद्युत के सहारे संदेशों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने में सफलता प्राप्त की। सन् 1876 में वैज्ञानिक अलेक्जेंडर ग्राहम बेल (1847-1922) ने टेलीफोन का आविष्कार किया, इसमें ध्वनिसंदेशों/ऑडियो/आवाज़ को विद्युत एवं तारों के माध्यम से एक स्थान से दूसरे स्थान को भेजा जाता है। टेलीफोन अभी तक का एक बहुत उपयोगी तथा महत्त्वपूर्ण संचार साधन सिद्ध हुआ। सन् 1895- 1900 के बीच इतालवी वैज्ञानिक मारकोनी (1874-1937) ने इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडियो-तरंगों का आविष्कार कर बताया कि सन्देश को बिना तारोंवाले सिस्टम से भी भेजा जा सकता है। इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडियो तरंगों के अधिक विकास के बाद ध्वनि तथा चित्रों को रेडियो एवं टीवी के माध्यम से एक स्थान से दुनिया के किसी भी अन्य स्थान तक पहुँचाया जाना संभव हुआ। वर्तमान में पत्र/संदेशों के आदान-प्रदान के लिए इंटरनेट तथा कंप्यूटर या मोबाइल पर आधारित संदेश-संवहन प्रणाली लोकप्रिय हो चुकी है। कंप्यूटर-मोबाइल तथा इंटरनेट के तकनीकी संयोग से ई-मेल एवं वाट्सऐप-जैसी त्वरित एवं स्मार्ट मैसेजिंग विधियाँ वर्तमान में बहुत तेजी से लोकप्रिय हो रही हैं। इन विधियों में सन्देश भेजने में बहुत कम समय लगता है तथा यह प्रयोग करने में भी आसान है। इनमें भी ई-मेल विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

 

ई-मेल का अर्थ इलेक्ट्रनिक मेल है। जिसमें संदेशों को विद्युत-संकेतों के रूप में भेजा व प्राप्त किया जाता है। यह नामकरण भी भारत के मुंबई-निवासी शिवा अय्यादुरई ने किया था। ई-मेल द्वारा भेजे गए संदेश कुछ सैकंडों में ही पानेवाले के पास पहुँच जाते हैं। ई-मेल भेजने एवं प्राप्त करनेवाले के लिए मात्र कंप्यूटर या आधुनिक मोबाइल एवं इंटरनेट की आवश्यकता होती है। ई-मेल से संदेशों को भेजना अत्यधिक सुविधाजनक, सुरक्षित, आसान एवं कम समय लेनेवाला है। ई मेल में पहले संदेशों को की-बोर्ड या स्पीकर, कंप्यूटर एवं मॉडम के माध्यम से इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडियो तरंगों के साथ मिक्स किया जाता है, फिर इंटरनेट के माध्यम से वाञ्छित जगह भेज दिया जाता है, जहाँ उसे पुनः कंप्यूटर या मोबाइल, मॉडम एवं इंटरनेट की सहायता से लिखित या फोटो के रूप में प्राप्त कर लिया जाता है। प्राप्तकर्ता चाहे तो ई-मेल को कागज़ पर प्रिंट के रूप में भी प्राप्त कर सकता है।

ई-मेल के प्रमुख लाभ

ई-मेल के अवगुण एवं हानियाँ

उपर्युक्त समालोचना से दो बातें स्पष्ट रूप से उभरकर आती हैं। पहली यह कि, इससे संदेशों को बहुत कम समय एवं सस्ते में भेजा जा सकता है। दूसरे इसमें काग़ज़ की आवश्यकता नहीं पड़ती, जिससे परोक्ष रूप से पेड़ एवं पर्यावरण की रक्षा होती है।

ई-मेल की खोज तक पहुँचने के महत्वपूर्ण पड़ाव

ई-मेल का प्रयोग करने के लिए इंटरनेट तथा कंप्यूटर या मोबाइल होना आवश्यक है। इसके साथ ही सर्वर, मॉडम, प्रिंटर आदि सहयोगी उपकरण भी परिस्थिति के अनुसार प्रयोग में लाए जाते हैं। ये सभी उपकरण विद्युत से चलते हैं। ई-मेल के लिए विद्युत होना अनिवार्य है। विद्युत के बिना ई-मेल का अस्तित्व नहीं हो सकता। इसके स्वरूप का 90 प्रतिशत भाग विद्युत से तैयार होता है। दूसरे शब्दों में विद्युत को ई-मेल की आत्मा कहा जा सकता है।

विद्युत से ई-मेल तक की विकास-यात्रा

थेल्स के प्रयोगशुष्क सेल-डेनियल सेल> धातु के तार में विद्युत प्रवाहित करने से चुंबकीय क्षेत्र का निर्माण>विद्युत प्रभाव से लोहे को चुंबक बनाना>चुंबक तथा तार की कुंडली के प्रयोग>संदेश भेजने के लिए टेलीग्राम/तार-व्यवस्था का आविष्कार टेलीफोन का आविष्कार फैराडे द्वारा बड़े स्तर पर सतत रूप से विद्युत-उत्पादन का आविष्कार>इलेक्ट्रॉन की खोज>इलेक्ट्रॉन की प्रकृति एवं विद्युत धाराप्रवाह से संबंध की खोज>विद्युत अर्धचालकों की खोज>विद्युत निर्वात वाल्व की खोज>विद्युत ट्रांजिस्टर की खोज>इलेक्ट्रो मैग्नेटिक रेडियो तरंगों को पैदा करना>रेडियो द्वारा ध्वनि-संदेशों का प्रेषण>टी.वी. द्वारा चित्र-संदेश को इलेक्ट्रो मैग्नेटिक रेडियो-तरंगों में बदलकर प्रेषण>ध्वनि, चित्र एवं अन्य तरीकों से प्राप्त संदेशों को इलेक्ट्रो मैग्नेटिक रेडियो-तरंगों द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचाने की तीव्रगामी व्यवस्था (इंटरनेट तथा मॉडेम का विकास)।

सन् 1895 से 1900 के बीच मारकोनी ने इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडियो वेव्स की खोज की, जिससे संकेतों का बिना तार के एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने का मार्ग खुला। इसे बेतार के तार की खोज भी कहा जाता है। (ऐसी खोज जिसमें विद्युतसंकेतों को बिना तारों के सहारे एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजा जा सके)। बेतार के तार की खोज के बाद ध्वनि एवं चित्रों को ‘इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडियो वेव्स' के सहारे भेजने के प्रयास किए जाने लगे। इसी सिद्धांत के आधार पर ध्वनि को एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजने के लिए ‘वॉइस ओवर रेडियो वेव्स सिस्टम का आविष्कार एक अमेरिकी वैज्ञानिक फेसेनडेन (1866-1932) ने सन् 1906 के आस-पास किया। इस सिद्धांत पर बने उपकरण को रेडियो कहा गया। इसके कुछ वर्षों बाद चित्र एवं दृश्यों को भी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडियो वेव्स के सहारे एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजा जाना संभव हो गया। टेलीविजन इस तकनीक पर बनाया गया सबसे लोकप्रिय उपकरण साबित हुआ।

सन् 1906 में अमेरिकी वैज्ञानिक ली- डे-फॉरेस्ट (1873-1961) ने ट्रायोड नामक उपकरण की खोज की। इससे रेडियो-तरंगों की गुणवत्ता में सुधार का रास्ता खुला। इसी वर्ष सर एंब्रोस फ्लेमिंग (1849-1945) नामक एक ब्रिटिश वैज्ञानिक ने वैक्यूम ट्यूब की खोज की, इससे रेडियो-तरंगों की क्षमता में वृद्धि के साथ गुणवत्ता में बहुत सुधार हुआ। 1946 में पहला डिजिटल कंप्यूटर बनाया गया जिसका मुख्य आधार वैक्यूम ट्यूब थी। । वर्ष 1947 में ‘बेल टेलीफोन लेबोरेटरीज़' द्वारा ट्रांजिस्टर नामक डिवाइस की खोज हुई, जो वैक्यूम ट्यूब का कॉम्पैक्ट रूप थी। वैक्यूम ट्यूब की तुलना में ट्रांजिस्टर बहुत कम स्थान घेरता है तथा खराब भी कम होता है। ट्रांजिस्टर में सेमीकंडक्टर पदार्थ का प्रयोग किया जाता है। ट्रांजिस्टर के आविष्कार ने इलेक्ट्रॉनिक्स को इतनी ऊँचाइयाँ प्रदान की। कि यह क्षेत्र विद्युतविज्ञान से अलग होकर स्वतंत्र पहचान बनाने में कामयाब हुआ। इस आविष्कार को इलेक्ट्रॉनिक्स युग में प्रवेश का कदम माना जा सकता है।

सन् 1958 में अमेरिकी वैज्ञानिक जैक किल्बी (1923-2005) ने इंटीग्रेटेड सर्किट का आविष्कार किया। इसमें छोटे-से स्थान के अंदर सैकड़ों- हज़ारों सेमीकंडक्टरों, रजिस्टेंस आदि का तार्किक समूहन किया जा सकता है। इस खोज से विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का आकार बीसियों गुना कम होने लगा।

आई.सी. के प्रयोग ने कंप्यूटर के आकार को बहुत कम कर दिया तथा उसकी काम करने की गति को हजारों गुना बढ़ा दिया। इससे कंप्यूटर की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट हुआ तथा वह निरंतर उपयोगी बनता चला गया। कंप्यूटर से विभिन्न काम लेने के लिए उनसे संबंधित सॉफ्टवेयर तथा एप्लीकेशन की ज़रूरत पड़ती है। कंप्यूटर के बढ़ते उपयोग से इसका निर्माण तेज हो गया। जैसे अभी तक टाइपिंग के काम को टाइपराइटर के द्वारा किया जाता था। कंप्यूटर ने इस काम को बहुत सरल व तेज कर दिया। दफ्तरों में समय का बड़ा हिस्सा, पत्रों को लिखकर भेजने में बेकार चला जाता है। इससे बचने के लिए पत्र एवं संदेशों को कंप्यूटर पर टाइप करके, वहीं से अन्य कंप्यूटर पर सीधे भेजने की बात सोची गयी। ऐसे ही एक प्रयास में सन् 1961 के आसपास टॉम वलेक ने अक्षरों को इलेक्ट्रॉनिक फॉर्म में बदलकर कंप्यूटर पर देखने लायक बनाया।

वर्ष 1969 में वैज्ञानिक लियोनार्ड ने आपस में जुड़े दो कंप्यूटर के बीच सन्देश का आदान-प्रदान करना संभव किया। यह घटना ई-मेल की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम था। वर्ष 1971 में रे टमलिंसन (1941-2016) नामक अमेरिकी कंप्यूटर वैज्ञानिक ने अनेक कंप्यूटरों के बीच संदेश के आदान-प्रदान की खोज की।

ई-मेल प्रणाली एवं परंपरागत डाकव्यवस्था की तुलना

इंटरनेट-व्यवस्था में मोबाइल एवं कंप्यूटर की की-बोर्ड तथा वॉइस इनपुट लेखनी एवं इंक की तरह काम करती है। संदेशयुक्त विद्युत चुंबकीय रेडियो-तरंगें, परंपरागत चिट्ठी के काग़ज़ का काम करती हैं। कंप्यूटर या मोबाइल में इंटरनेट को चला सकनेवाला मॉडम डाकघर या पोस्ट बॉक्स का काम करते हैं। इंटरनेट डाकिया का काम करते हैं। ई-मेल की आई.डी. घर के पते के समान होती है। वर्तमान में ई-मेल का प्रयोग करनेवाले लोगों की संख्या विश्व के हर कोने में तेजी से बढ़ रही है। ई-मेल को ऑफिस में या साइबर कैफे के साथ साथ स्मार्टफोन से भी भेजा एवं प्राप्त किया जा सकता है। यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि ई-मेल, आज की डाक-व्यवस्था का मज़बूत स्तम्भ बनती जा रही है। आशा है कि ई-मेल से कागज़ के प्रयोग में कमी आएगी और वृक्ष तथा पर्यावरण-संरक्षण में वृद्धि होगी।