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हस्तमुद्राओं द्वारा चिकित्सा
August 27, 2018 • Navlekha Team

ईश्वर ने मानव शरीर को बहुत ही वैज्ञानिक ढंग से रचा है। इस शरीर की रचना पाँच तत्त्वोंआकाश, वायु, अग्नि, जल आकाश, वायु, अग्नि, जल व पृथिवी से मिलकर हुई है। मनुष्य के हाथ की पाँच अंगुलियों में बहुत गहरा विज्ञान समहित है। अनेक विद्वानों, ज्योतिषियों, चिकित्सकों ने अपने-अपने ढंग से खोज करके तथ्य प्रस्तुत किए है। इन सभी तथ्यों की अपनी महत्ता है।

प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार मनुष्य की चारों उंगलियों एवं अंगूठे भी पाँच तत्त्वों में बँटे हैं: अंगूठा-अग्नि तत्त्व, तर्जनी-वायु तत्त्व, मध्यमा-आकाश तत्त्व, अनामिका-पृथिवी तत्त्व तथा कनिष्ठा जल तत्त्व वाली उंगली होती है।

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार अंगूठा-शुक्र, तर्जनी-बृहस्पति, मध्यमाशनि, अनामिका-मंगल तथा कनिष्ठा उंगली के नीचे बुध के क्षेत्र होते हैं, तथा इसमें स्थित विभिन्न प्रकार की रेखाएँ व चित्र जीवन के अनेक रहस्यों को उजागार करते हैं।

कर्मकाण्डानुसार भी हथेली के अनके स्थानों की महत्ता का वर्णन इस प्रकार किया है-

कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।

करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्॥

अर्थात् हाथ के अग्रभाग में लक्ष्मी, मध्य में सरस्वती और हाथ के मूल भाग में विष्णु जी निवास करते हैं, अतः प्रातःकाल दोनों हाथों का अवलोकन करना चाहिये।

एक्युप्रेशर चिकित्सा अनुसार : चारों उंगलियों के अग्रभागों में साइनस के केन्द्र-बिन्दु, अंगूठे के अग्रभाग में सिरदर्द, तथा प्रथम पोर के नीचे चिन्ता, थोड़ा नीचे उदासीनता ठीक करने के केन्द्रबिन्दु तथा हथेली में सभी मुख्य अंगों की विकृति को दूर करने के केन्द्रबिन्दु होते हैं।

हस्तमुद्राओं का महत्त्व

हाथ की उंगलियों तथा अंगूठा द्वारा मुद्राएँ बनाकर हम कई बीमारियों का उपचार कर सकते हैं। ये महत्त्वपूर्ण मुद्राएँ शारीरिक, मानसिक (मन, बुद्धि, भावात्मक सन्तुलन, शक्ति, प्रतिभा) तथा आध्यात्मिक (शान्ति, एकता, ध्यान धारणा, समाधि, आदि) स्तरों में परिवर्तन तथा सन्तुलन में बहुत लाभकारी एवं सहयोगी होती हैं। इनसे शरीर की सभी नलिकाविहीन ग्रंथियों, धमनियों, कोशिकाओं तथा ज्ञानेन्द्रियों में सक्रियता एवं समन्वय आता है। इन मुद्राओं से तीव्र व जीर्ण रोगों को कुछ दिन लगातार प्रयास करने करके कुछ हद तक ठीक किया जा सकता है। इन मुद्राओं को लगाने से शरीर में कोई नुकसान एवं दुष्प्रभाव का डर नहीं है।

वैसे तो ये मुद्राएँ 24 प्रकार की होती हैं। इन मुद्राओं का अपना महत्त्व है। दिन-रात में 24 घंटे की चौघड़िया होती है, विष्णु के 24 अवतार माने गए हैं, जैन-मत में 24 तीर्थंकर बताए गए हैं तथा गायत्री-मन्त्र भी 24 अक्षरों से युक्त है। तो आइये, हाथ की कुछ महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक मुद्राओं के बारे में जानने की कोशिश करते हैं।

ज्ञान-मुद्रा

अध्यात्म जगत् में ऋषि, तपस्वी, ज्ञानी, ध्यानी-सब इसी मुद्रा को अपनाते हैं। सुखासन, पद्मासन, स्वस्तिकासन में रीढ़ सीधी करके बैठे। दोनों हाथों के अंगूठे एवं तर्जनी उंगली के अग्रभाग को स्पर्श करें तथा अन्य तीन उंगलियों को सीधा रखें। यह मुद्रा चाहे जितनी देर कर सकते हैं। इसमें खान-पान, समय का परहेज नहीं है। लाभ : इससे स्मरण शक्ति तेज होती है। विद्याथियों, के लिये बहुत लाभकारी है। यह मुद्रा धारण, ध्यान, समाधि में बहुत फ़ायदेमन्द है, इसको करने से एकाग्रता बढ़ती है, मन शान्त होता है। शिरदर्द, अनिद्रा, काम, क्रोध को दूर करती है। नित्य कुछ घंटे इस मुद्रा में बैठें, लाभ स्वतः पता चल जायेगा।

वायु-मुद्रा

आप किसी भी आरामदायक आसन में बैठकर तर्जनी अंगुली नीचे की और मोड़कर अंगूठे के प्रथम पोर से मुड़ी अंगुली में रखकर दबा लें, वायु-मुद्रा बन जायेगी। रोज सुबह-शाम आधा घन्टा लगायें। लाभ : शरीर में व्याप सभी प्रकार के वायु-रोगों- गठिया, लकवा, कम्पन, गैस, जोड़ों के दर्द ठीक होते हैं। रक्त-संचरण संस्थान में भी लाभ होता है।

शून्य-मुद्रा

किसी भी सुख, वज्र, पद्मासन में सीधा बैठकर घुटनों पर हाथ सीधा रखकर मध्यमा (आकाश तत्त्व) की अंगुली को अन्दर की ओर मोड़कर अंगूठे से दबाएँ। यह मुद्रा 3045 मिनट नित्य प्रातः-सायं करनी चाहिए। लाभ : कान-दर्द, कम सुनना, कान में साँयसाँय करना, कान का बहना में लाभकारी है। अस्थियों की निर्बलता दूर होती है। मसूड़े मज़बूत होते है तथा थायराइड में भी लाभ करती है।

सूर्य-मुद्रा

किसी भी आरामदायक आसन में सीधे बैठ जाएँ तथा दोनों हाथ की सभी अंगुलियों को सीधा करें, तत्पश्चात् अनामिका अंगुली को अन्दर की और मोड़कर अंगूठे से दबा लें। यह मुद्रा खाली पेट सुबह-शाम 15-20 मिनट करें। पेट में गैस, अपच, गुड़गुड़ाहट या अन्य गड़बड़ी हो तो न करें। भोजन के बाद न करें। लाभ: इस मुद्रा को नित्य करने से मोटापा कम होता है, पाचन-क्रिया में लाभ होता है, शरीर से बलगम भी निकल जाता है। इससे नसों का कॉलोस्ट्रॉल कम होता है। इससे पृथिवी तत्त्व (स्थूलता) कम होती है। इस मुद्रा को शीतकाल में अधिक करना चाहिये।

पृथिवी-मुद्रा

किसी भी सुखासन, पद्मासन, स्वस्तिकासन में बैठकर अनामिका एवं अंगूठे के अग्रभाग को आपस में स्पर्श करें तथा अन्य अंगुलियों को सहज भाव में बिना जोर लगाए सीधा रखें। इस मुद्रा के लिये कोई समयसीमा नहीं है, जितनी देर इच्छा करे, लगाएँ। लाभ : इससे शरीर का रक्तप्रवाह सक्रिय, सुचारू रूप से चलता है। दुबले-पतले शरीर के लोगों के लिये लाभप्रद है। इससे सहनशक्ति, शारीरिक शक्ति बढ़ती है। इस शरीर की कृशता और अल्पता, धैर्य की कमी ठीक होती है। यह मुद्रा विटामिन की कमियों को पूर्ण करती है।

वरुण-मुद्रा

वरुण-मुद्रा को कैसे भी बैठकर, लेटकर कर सकते हैं। अंगूठे एवं सबसे छोटी कनिष्ठा अंगुली के अग्रभागों को आराम में स्पर्श करें तथा शेष अंगुलियों को सीधा रखें, इससे वरुण-मुद्रा बन जाती है। कनिष्ठा अंगुली के नाखून के नीचे ज्यादा तेज न दबाएँ अन्यथा दस्त की शिकायत हो सकती है। लाभ : इससे शरीर में जल तत्त्व की कमी नहीं होती है। वरुण, जल के देवता होते हैं, अतः इस मुद्रा को करने से जल की मात्रा प्रचुर मात्रा में प्राप्त होती है। त्वचा की खुस्की दूर रहती है। यह चेहरे के मुहांसे, कील, फुसी, सूखापन को दूर करती है तथा चेहरा सुन्दर रहता है। यह कब्ज़ को भी दूर करती है। यह मुद्रा ग्रीष्मकाल में बहुत लाभदायक है।

हृदय-मुद्रा

सुखासन, पद्मासन तर्जनी अंगुली को अन्दर की ओर मोड़कर अंगूठे से इस प्रकार दबाएँ कि अंगूठे का अग्रभाग मध्यमा तथा अनामिका के प्रथम पोरों के मोड़ की लाइनों में स्पर्श करें। ये दोनों अंगुलियाँ थोड़ा आगे की ओर झुकी रहेंगी तथा कनिष्ठा सीधी रहेगी। यह मुद्रा 15-30 मिनट सुबह-शाम करें। खाली पेट ज्यादा लाभदायक होगा। लाभ : यह मुद्रा हृदय-रोग में बहुत लाभकारी है। यदि दिल का दौड़ा पड़ गया हो तो मरीज के दोनों हाथों हृदय मुद्रा लगवा दें तथा शीघ्र अस्पताल ले जाएँ। इससे हृदय अवरुद्ध नहीं होगा। इसीलिये इसका नाम हृदय-मुद्रा रखा है। उच्च रक्तचाप व निम्न रक्तचाप के रोगियों को इस मुद्रा का अभ्यास नित्य करना चाहिये। यह हृदय की धड़कनों को नियन्त्रित एवं सुनियोजित करती है। इसको करने से हृदय बलशाली तथा सक्रिय रहता है।

प्राण-मुद्रा

इस मुद्रा को सुखासन, पद्मासन, वज्रासन, आदि में बैठकर करें। इसमें अनामिका तथा कनिष्ठा अंगुली के अग्रभागों को एकसाथ अंगूठे के अग्रभाग से स्पर्श करें। बाकी दो अंगुली सीधी रखें। यह मुद्रा 15-45 मिनट दिन में एक-दो-तीन बार कर सकते हैं। लाभ : यह प्राणवायु को सबल तथा जाग्रत् करती है। इससे शरीर में ताजगी व स्फूर्ति आती है। इससे प्राणवायु ऑक्सीजन सामान्य रक्त से पूरे शरीर में पहुँचती है।इससे आँखों का फायदा होता है। इससे शारीरिक-मानसिक शक्ति बढ़ती है।

 

अपान-मुद्रा

यह मुद्रा भी सुखासन, वज्रासन, आदि में बैठकर मध्यमा तथा अनामिका अंगुली के अग्रभागों को अंगूठे के अग्रभाग से स्पर्श करें तथा तर्जनी व कनिष्ठा सीधी रखें। यह मुद्रा 15-45 मिनट सुबह-शाम लगा सकते हैं। इसे मृतसंजीवनी मुद्रा भी कहा जाता है। लाभ : यह अपान वायु को नियन्त्रित करती है। यह पेट के अन्दर बन रही दूषित वायु को बाहर निकालती है। यह हृदय-रोग, सिरदर्द, उच्च रक्तचाप, दमा, वात-रोगों को ठीक करती है।

आकाश-मुद्रा

सुखासन, पद्मासन, स्वस्तिकासन में बैठकर अंगूठा तथा मध्यमा अंगुली के मध्य भाग को मिलाएँ। शेष अंगुलियाँ सीधी रखें। यह प्रातः-सायं 15-45 मिनट कर सकते हैं। लाभ : शून्य-मुद्रा के लाभ हैं, वे इसमें भी हैं। इसके अतिरिक्त हड़ियों की दुर्बलता दूर होती है, तनाव दूर होता है, मसूड़े मजबूत होते हैं तथा थायराइड में भी लाभ होता है।

गिरिवर-मुद्रा 

भगवान् श्रीकृष्ण ने इस मुद्रा को बनाकर कनिष्ठ अंगुली से गोवर्धन पर्वत उठाया था, इसलिये इसका नाम गिरिवर-मुद्रा पड़ा। इसमें कनिष्ठ अंगुली को सीधा करें तथा शेष तीन अंगुलि यो (तर्जनी, मध्यमा, अनामिका) को मोड़कर अंगूठे से दबाएँ। यह कैसे भी खड़े होकर अथवा बैठकर 5-20 मिनट कर सकते हैं। लाभ : इससे मूत्रविसर्जन ठीक तरह से होता है। इससे यूरिक एसिड, प्रोटीन तथा अन्य पदार्थों, लवणों का विसर्जन सुगमता से होता है तथा मूत्र-विकार नहीं होता है। रक्त के अनावश्यक पदार्थ शीघ्र निकल जाते हैं।