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जलस्रोतों की कला और वैशिष्ट्य
August 27, 2018 • Navlekha Team

वृष्टि, वायु और वन भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि से पर्यावरण के मूलाधार हैं। इनका परस्पर संबंध है और ये अन्योन्याश्रित भी हैं। पानी से ही मानव की जिंदगानी है। कहने को तो पानी के सौ पर्यायवाची हैं, मगर उसका विकल्प एक भी नहीं है। इसलिए लोकाञ्चल में पानी को जीवन के लिए अति आवश्यक तत्त्व के रूप में स्वीकारा गया है। पानी के लिए नाना जतन पर जोर दिया गया है और यह जतन पानी को पाने से लेकर पानी को लाने और बचाने तक के लिए करने पर बल दिया जाता रहा है।

राजस्थान को तो जांगल प्रदेश कहा गया है, जहाँ पानी का सदा अभाव ही रहा है और ऐसे अभावों के बीच जीव ने अपने जीवन को बचाने के लिए बहुत प्रयास किया है। यहाँ वायु के चलने, वनस्पति के फलने और तारा-नक्षत्रों के चमकने के आधार पर वर्षा का ज्ञान किया जाता रहा है। यहीं के सारस्वत मुनि ने सर्वप्रथम भूमिगत जल ज्ञान के संबंध में कार्गलजैसा शास्त्र लिखा तो यहाँ विचरनेवाले भार्गवों ने उस ज्ञान का विकास किया और मनु के मत के रूप में लिखा। पराशर मुनि की विहारस्थली भी यही प्रदेश रही है। जिन्होंने कृषकों और बागवानों-मालियों के हित में वर्षा-विज्ञान को संस्कृत में लिखा जबकि घाघ या गर्ग ने सर्वप्रथम इस संबंध में लोकाञ्चल में कही जानेवाली उक्तियों को विभिन्न छंदों में लिखकर कंठकोश पर अमर कर दिया।

यहाँ जल-विषयक स्थापत्य की परंपरा अति ही विशिष्ट रही है। विशेषकर गुर्जरत्र प्रदेश होने के दौरान राजस्थान से लेकर गुजरात तक के विभिन्न मार्गों पर कूप, बावड़ियों और मन्दिरों के आगे व पार्श्व में कुंडों का निर्माण किया जाता थाविष्णुधर्मोत्तरपुराण में कहा गया है कि जो व्यक्ति तालाब, कूप-जैसे जलस्रोत बनवाता है, कन्यादान करता है, छत्र, पाँव में जूते आदि देता है, वह स्वर्ग को जाता है- तडाग कूप कर्तारस्तथा कन्या प्रदायिनः। छत्रोपानह दातारन्ते नराः स्वर्गगामिनः॥

अपराजितपृच्छा, जिसकी रचना चित्तौड़गढ़ में राजस्थान और गुजरात की पृष्ठभूमि और वहाँ की आवश्यकता को लेकर की गई है, में विश्वकर्मा के मुँह से कहलाया गया है कि प्रत्येक नगर के बाहर और अन्दर की ओर भी विविध प्रकार के जलाशयों की व्यवस्था होनी चाहिए, क्योंकि जल ही जीवन है। ऐसे में वहाँ वापी, कूप, तड़ाग, कुण्ड आदि विविध प्रकार के जलस्रोत बनाएँ। इसी प्रकार आदित्यपुराण में आया है कि सेतुबंध जैसे व्यक्ति को पार ले जाते हैं और तीर्थ विविध चिन्ताओं से मुक्त करते हैं, वैसे ही तालाब बनवानेवाला प्राणियों को प्यास के भय से मुक्ति देता है : सेतुबन्धरता ये च तीर्थशौचरताश्च ये। तडागकूपकर्त्तारो मुच्यन्ते ते तृषाभयात्॥

भावप्रकाश-जैसे आयुर्वेद-ग्रंथ में कहा कि अल्प विस्तार से जहाँ मण्डलाकृति में भूमि को खोदा जाता है और जिस गर्त में पानी मिलता है, वह चाहे बँधा हुआ हो या निर्बन्ध हो, कूप कहा जाता है।

अपराजितपृच्छा में दस प्रकार के कुओं को बनवाने का निर्देश है और उनका प्रमाण भी दिया गया है। श्रीमुख कूप 4 गज का चौड़ा होता है। विजय कूप 5 गज चौड़ा, प्रान्त कूप 6 गज, दुन्दुभि 7 गज, मनोहर 8 गज, चूड़ामणि १ गज, दिग्भद्र 10, जय 11 गज, नन्द 12 गज और शंकर 13 गज का होता है। तब हाथ या गज का प्रमाण चौबीस अंगुल का माना जाता था। इन प्रमाणों से छोटे आकारवाली कुइयाँ होती है। कुइयाँ 3 गज की चौड़ाई से भी कम की होती हैं। इनमें 3 गजवाली, 2 गजवाली आदि कूपिकाओं में दो गज की चौड़ाई वाली कूपिकाएँ सभी काम में शुभ मानी जाती थीं और पूर्वकाल में उन्हें कर्तव्य समझकर बनाया जाता था।

बावड़ियों की शैली और स्वरूप:

राजस्थान से लेकर गुजरात तक बावड़ियों का निर्माण एक आवश्यकता के रूप में 10वीं शती के बाद व्यापक स्तर पर होने लगा। इनका निर्माण बहुत युक्तिपूर्वक होता था। अपराजितपृच्छा और राजवल्लभ में कहा गया है कि वापी या बावड़ियाँ चार प्रकार की होती हैं- 1. नन्दा 2. भद्रा 3. जया 4. विजया। इनमें से नन्दा वापी एकमुखी होती है और तीन ओर से कूट अर्थात् बन्द होती है। ‘भद्रा' नामक वापी के दो ओर मुख होते हैं। उसमें दो ओर से आवागमन होता है और छह ओर से रोक होती है। तीन ओर के आवागमनवाली तीसरी ‘जया' वापी में नौ ओर रोक होती है। ‘विजया' वापी के चारों ओर आवागमन योग्य सीढ़ियाँ और बारह रोक होती है।

कुंडों की कलात्मकताः

गुजरात और राजस्थान ही नहीं, अन्य प्रदेशों में भी देवालयों के आगे कुंडों का निर्माण होता आया है। बृहत्संहिता के काल, छठी शती से ही इस प्रकार की परम्परा चल पड़ी थी। चार प्रकार के कुंड हैं: 1. भद्रक, 2. सुभद्रक, 3. नन्दाख्य व 4. परिघ।।

राजवल्लभ और दीपार्णव-जैसे शास्त्रों का निर्देश है कि शान्ति के इच्छुकों को इनको देवमन्दिरों के आगे बनाना चाहिए। इनमें से भद्रक कुण्ड चौकोर होता है और सुभद्र कुण्ड के चारों ओर दीवारें या भद्र होते हैं। नन्दा नामक कुण्ड के भी प्रतिभद्र और परिघ कुण्ड के मध्य में भिट्ट की रचना होती है। इन कुण्डों के चारों ओर चार द्वार बने होते हैं और जिनपर गोखड़े बने होते हैं। मध्य की ओर तथा उन गवाक्षों-गोखड़ों के मस्तक की ओर से बायें-दायें प्रवेश-मार्ग बने होते हैं। कुण्ड में प्रवेश और निर्गम अनेक प्रकार के बनाए जाते थे। इनके कोनों पर चौकियाँ भी बनाई जातीं और ये चौकियाँ और तवंग एवं पट्टशालिका से युक्त छतरियों के रूप में बनाई जाती थी। इसमें श्रीधर नामक माड प्रतिष्ठा की जाती थी।

इन बावड़ियों और कुंडों की भित्तियों की ताकों में देव-प्रकोष्ठ बनाकर देवी- देवताओं की मूर्तियों की प्रतिष्ठा की जाती थी। अपराजितपृच्छा का निर्देश है कि कुण्ड के मध्य में जलाशयी वाराह बनाया जाना चाहिए। कुण्डों के दीवारों पर और द्वारों पर एकादश रुद्र मूर्तियाँ और महर्षि दुर्वासा, देवर्षि नारद व विविध गणनायक देवताओं की मूर्तियाँ प्रशस्त मानी जाती थीं। इन मूर्तियों में क्षेत्रपाल, भैरव, उमामहेश्वर, कृष्णशंकर और विशेष करके दण्डपाणि यमराज-धर्मराज की भी स्थापना की जाती थी। ऐसे ही कात्यायनी, चण्डिका, मल्लस्वामी, भास्कर, हरिहर पितामह तथा चन्द्रादित्य पितामह, हरिहर स्वर्णगर्भ की स्थापना की जाती थी। वहाँ पट्टशाला वाराणसी का विन्यास किया जाता था। चौदह महादेव के लिंगों तथा एकादश रुद्रों तथा द्वादशादित्यों और द्वादश गणाधिपों को भी स्थापित की जाती थी। पञ्चलीलाओं, नवदुर्गा, पञ्चलोकपालों, तीनों अग्नियों, अष्टदिक्पालों तथा अष्टमातृकाओं, चारों समुद्रों और गंगा-यमुना आदि नदियों के स्वरूपों को बनाया जाता था।

थार में जल से प्यार

भारतीय प्रदेशों में राजस्थान ने पानी को बहुत महत्त्व दिया है। यहाँ पानी नहीं था, इसलिए पानी को बचाने पर जोर दिया गया और पानी के स्रोतों को विशेष रूप से सहेजा गया। पानी को सहेजने, भरकर लाने और पनघट के मार्ग की पीड़ा और पड़ौसी सहित रसिकों की नज़रों की नतीजों को यहाँ की नारियों ने बहुत जाना, इसलिए यहाँ के लोकगीतों में भी पनिहारी ही एक पात्र के रूप में नहीं मिलती, बल्कि पनघट के मार्ग में जाती देवराणी-जेठानी, ननद-भौजाई की बातों को भी अभिव्यक्ति मिली है। मटकी, कलश, छुकलिया, बेवड़ा, भांडा, कुंभजैसे जलपात्रों के साथ ही ईडोणी पर भी गीतों की रचना हुई है। ये गीत विशेष तालों में गाए जाते हैं।