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आयुर्वेद : इतिहास, उपादेयता एवं प्रासंगिकता
August 26, 2018 • Navlekha Team

 भगवान् ब्रह्मा के मुख में निर्गत चारों वेदों में से प्रथम ऋग्वेद एक है, जिसका उपवेद आयुर्वेद है। संसार में जब बीमारियाँ बढ़ने लगीं, तब इन रोगों मानव जीवन के उद्देश्य, जैसे- धर्म- अर्थ-काम-मोक्ष की प्राप्ति में बाधा उत्पन्न की। इसके समाधान हेतु एक विशिष्ट क्रम में आयुर्वेद को स्वर्ग से धरती पर लाया गया। ब्रह्मा ने यह ज्ञान दक्ष प्रजापति को, दक्ष प्रजापति ने अश्विनीकुमारों को, अश्विनीकुमारों ने इन्द्र को, इन्द्र ने भरद्वाज तथा धन्वन्तरि आदि को दिया उन्होंने अपने शिष्यों के मध्यम से इस ज्ञान का संहिताकरण किया। आज भी ये संहिताएँ अपने मूल रूप में विद्यमान हैं, उदाहरण के लिए चरकसंहिता, सुश्रुतसंहिता एवं काश्यपसंहिता। बाद में इनको सरल करने हेतु अष्टांगसंग्रह, अष्टांगहृदय, माधवनिदानसंहिता, भावप्रकाश, शाङ्गधरसंहिता आदि अनेक ग्रन्थ रचे गये। अलग-अलग टीकाकारों ने कठिन संस्कृत-शब्दों को सरल-सुबोध बनाने के लिये अपना मत प्रकाशित किया है।

आयुर्वेद लिखनेवाले पुरुष को आप्त कहा जाता है, जिनको त्रिकाल (भूत, वर्तमान, भविष्य) का ज्ञान था। यद्यपि आयुर्वेद बहुत पुराने काल में लिखा गया है, तथापि वर्तमान में नये रूप में उभरनेवाली हर बीमारियों का समाधान इसमें समाहित है। आयुर्वेद मतलब जीवनविज्ञान है। अतः यह सिर्फ एक चिकित्सा-पद्धति नहीं है, जीवन से सम्बधित हर समस्या का समाधान इसमें समाहित है।

आयुर्वेद की उपयोगिता

आयुर्वेद के दो मुख्य प्रयोजन हैं :

1. स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की करना।

2. रोगी व्यक्ति के रोग की चिकित्सा ।

स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना।

स्वस्थ का मतलब सिर्फ रोगमुक्ति ही नहीं, बल्कि आयुर्वेद के अनुसार एक व्यक्ति को स्वस्थ तब कहेंगे जब उसके दोषशारीरिक (वात, पित्त, कफ) तथा मानसिक (रज व तम) समान हों, अग्नि पाचनशक्ति) सामान्य हो, धातु (रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र) हो, मल-मूत्रादि क्रिया उचित प्रमाण तथा समय पर हो तथा आत्मा, इन्द्रियाँ व प्रसन्न हो। आयुर्वेद के अनुसार सुख मतलब आरोग्य है एवं दुःख का मतलब रोग।

रोगी व्यक्ति के रोग की चिकित्सा

आयुर्वेद के अनुसार सम्पूर्ण चिकित्सा को त्रिविध रूप में विभाजित किया गया है ।

1. देव व्यापाश्रय चिकित्सा ।

2. युक्ति व्यापाश्रय चिकित्सा

3. सत्त्वावजय-चिकित्सा

रोग मुख्यतः दो प्रकार का होता है ।

शारीरिक व मानसिक। शारीरिक रोग ठीक करने हेतु देव व्यापाश्रय व युक्ति व्यापाश्रय चिकित्सा की जाती है। जबकि मानसिक विकार को चिकित्सा हेतु सत्त्वावजयचिकित्सा की जाती है।

देव व्यापाश्रय चिकित्सा

मंत्रप्रयोग, औषधि-धारण, मणिधारण, मंगलकर्म, बलि (दान), उपहार, होम, नियम, प्रायश्चित्त, उपवास, प्रणिपात, गमन तीर्थयात्रा) आदि कर्म इस चिकित्सा के अन्तर्गत आते हैं।

युक्ति व्यापाश्रय चिकित्सा

यह आवश्यक आहार-विहार तथा औषधि द्रव्य द्वारा किया जाता है। आधुनिक चिकित्साशास्त्र में यह मुख्य चिकित्सा है। आयुर्वेद में भी आजकल ज्यादातर इसी के ऊपर ध्यान दिया जाता है जो कि अपूर्ण चिकित्सा है। औषधि-चिकित्सा के अन्तर्गत समस्त शस्त्र कर्म भी आ जाते हैं। जो मुख्यतः सुश्रुतसंहिता में वर्णित है।

सत्त्वावजय-चिकित्सा

इसका मतलब है अहित अर्थ से मन को दूर रखना। यह ज्ञान, विज्ञान (वेद, पुराण, धर्मग्रन्थ आदि), धैर्य, स्मृति (स्मरणशक्ति अर्थात् बीते हुए कर्म तथा उसके फल को याद रखना तथा पढ़े हुई या सुनी हुई अच्छी बातें याद रखना), समाधि आदि द्वारा मानसिक बीमारी ठीक की जा सकती । इस आरोग्यावस्था को बनाए रखने केलिये आयुर्वेद में विशद वर्णन है जिसको स्वस्थवृत्र कहा जाता है। स्वस्थवृत्त के अन्र्तगत निम्नलिखित उपदेश हैं :

दिनचर्या- प्रतिदिन की जानेवाली क्रियाएँ।

ऋतुचर्या- प्रत्येक ऋतु में आहार विहार में क्या विशेषता है यानि किस ऋतु में क्या-क्या आहार-विहार का सेवन करना चाहिये तथा क्या-क्या नहीं करना चाहिये का विशद वर्णन इसके अन्तर्गत किया गया है।

धारणीय व अधारणीय वेग- शरीर में स्वाभाविक रूप से कुछ शारीरिक एवं मानसिक क्रिया की इच्छा उत्पन्न होती हैं, जिनको वेग कहा जाता है। उनमें से कुछ वेग को रोकना चाहिये जिनको धारणीय वेग कहा जाता है। एवं कुछ वेग का बलपूर्वक नहीं रोकना चाहिये जिनको अधारणीय वेग कहा जाता है। धारणीय वेग को तीन भागों में बाँट सकते हैं- शारीरिक, वाचिक (बोलना) एवं मानसिक। शारीरिक यानि दूसरे को पीड़ा देनेवाले कर्म, परस्त्री संभोग, चोरी, हिंसा आदि; वाचिक में अत्यन्त कठोर वचन, चुगलखोरी, झूठ बोलना, अनुचित समय पर बोलना तथा अनावश्यक बातें करना आदि; मानसिक वेग के अंतर्गत लोभ, शोक, भय, क्रोध, अहंकार, निर्लज्जता, ईष्र्या, अतिराग, दूसरे का धन लेने की इच्छा आदि। इन वेगों को प्रयत्नपूर्वक धारण अर्थात् शरीर के अन्दर दबाए रखने की कोशिश करनी चाहिए।अधारणीय वेग के अंतर्गत मल, मूत्र तथा अपानवायु का त्याग, वीर्यत्यागभूख, प्यास, डकार-जंभाई, छींक उल्टी, आँसू, निद्रा व श्रमजनित श्वास आदि वेग को नहीं रोकना चाहियेक्योंकि इनके वेग को धारण करने से नाना प्रकार के रोग उत्पन्न हो सकते ।

पञ्चकर्म द्वारा शरीरशुद्धि

चिकित्सा की दृष्टि से आयुर्वेद में पञ्चकर्म का बहुत महत्त्व है। उसके साथ-साथ शरीर को स्वस्थ बनाए रखने भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। ऋतु के हिसाब से शरीर में स्वाभाविक रूप में दोषवृद्धि होती है, उन दोनों को उपयुक्त ऋतु में पञ्चकर्म द्वारा शरीर से बाहर निकाल दिया जाए, तो आगे ऋतुजनित बीमारी नहीं होती है।

रसायन का सेवन- शरीरशुद्धि के बाद औषधि रसायन का सेवन करने से मनुष्य दीर्घायु, स्मरणशक्तिसम्पन्न, मेधा, आरोग्य, तरुणावस्था, प्रभा, वर्ण, वाणी की मधुरता, उत्तम बल प्राप्ति, वासिद्धि, नम्रता, कान्ति आदि सभी गुणों को प्राप्त करता है। इससे शिथिल मांसपेशियाँ दृढ़ होती हैं, जठराग्नि प्रद्दीप्त होती है, वात, पित्त, कफ सम रहते हैं, शरीर में स्थिरता उत्पन्न होती है। उदाहरणार्थ च्यवनप्राश, ब्रह्मरसायन, आमलकी रसायन, अगस्त्य रसायन तथा हरड़, आमला आदि। औषधि रसायन के अलावा एक आचार रसायन का भी वर्णन है जिसमें कुछ सदाचार बताया गया है जिनको पालन करने से औषधि रसायन सेवन किए बिना रसायन का फल प्राप्त कर सकते हैं, यथा- सत्य बोलना, अक्रोध, मद्य-मैथुन से दूर रहना, अहिंसा न करना, दान देना, देवता-गौ-ब्राह्मण, आचार्य, गुरुजनों व वृद्धजनों की पूजा व सेवा, उचित समय पर निद्रा त्यागना एवं सोना, अहंकार न करना, ज्यादा श्रम न करना, शान्त रहना, प्रियवादी बनना, पवित्रता में तत्पर, सदा दुग्ध व घृत सेवन, अपनी इन्द्रियों को आध्यात्मिक विषयों की ओर उन्मुख करना, आदि।

वाजीकरण का सेवन- शरीरशुद्धि के बाद गृहस्थ जीवन बितानेवाले को उत्तम सन्तान प्राप्ति हेतु तथा मैथुन में आसक्त पुरुष को वाजीकरण औषधिओं को सेवन करना चाहिये। इसके सेवन से यश, श्री, बल तथा पुष्टि की वृद्धि होती है, जैसेशतावरी, मुलेठी, अश्वगन्धा, घृत व दुग्ध, आदि।

प्रज्ञापराध का त्याग- धी, धृति, स्मृति के विभ्रंश होने से जो अशुभ कर्म किया जाता है, उसे प्रज्ञापराध कहते हैं। कर्म तीन प्रकार के होते हैंशारीरिक, वाचिक व मानसिक। इन तीनों कर्म के अतियोग (स्वाभाविक ज्यादा करना), हिनयोग स्वाभाविक से कम करना) तथा मिथ्यायोग (गलत कर्म, अस्वाभाविक कर्म) ही प्रज्ञापराध है। उपर्युक्त वर्णित धारणीय वेग शरीर, वाणी एवं मन के मिथ्यायोग में आते हैं। इसके इलावा मल-मूत्रादि वेग को रोकना या बलपूर्वक निकालना, विकृत मनुष्यों की नकल करना, प्राणवायु को ज्यादा समय रोकना, क्लेशजनक व्रतोपवास करना, आदि प्रज्ञापराध हैं जिनका त्याग करना चाहिये। प्रज्ञापराध मानसिक एवं आगन्तुक (अभिघात, दुर्घटना, आदि) रोग का मुख्य कारण है।

यहाँ पर विशाल आयुर्वेद का एक संक्षिप्त रूप में विवेचन किया गया है। एक वाक्य में कहा जाए तो आयुर्वेद एक सम्पूर्ण चिकित्साशास्त्र है न कि एक वैकल्पिक चिकित्सा जो जीर्ण व्याधियों के लिए है। भारत के पराधीनता के दौरान यह भी पराधीन हो गया था जो कि अभी भी पूर्णरूप से मुक्त नहीं हो पाया है।

इसके फलस्वरूप बीमारियाँ दिनप्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं, जिनको नियन्त्रण करने में आधुनिक चिकित्साशास्त्र भी विफल है। अतः आयुर्वेद को पुनः सम्पूर्ण स्वतंत्र करने का समय आ गया है। केवल आयुर्वेद के जरिए ही समाज को सम्पूर्ण स्वस्थ बनाना सम्भव है। इसके लिए आयुर्वेद में वर्णित स्वास्थवृत्त को अपनी जीवनशैली में अपनाना पड़ेगा तथा स्कूलों के पाठ्यक्रम में इसका समावेश करना पड़ेगा।