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August 27, 2018 • Navlekha Team

पक्षियों पर जारी भारतीय डाक-टिकट

भारतीय डाक-टिकटों पर सर्वप्रथम दिखाई देनेवाला पक्षी संदेशवाहक कबूतर था। यह डाक टिकट 01 अक्टूबर, 1954 को जारी किया गया था जो 2 आने व 4 आने मूल्यका था। वर्ष 1968 के अंत में चार पक्षियों पर 20 पैसे के डाक-टिकटों का सेट जारी किया गया था। वर्ष 1974 में 50 पैसे के डाक टिकट पर उड़ान भरते हुए डेमोइजेल क्रेन एंथ्रोपोइड्स कुंजा को दर्शाया गया था। जब हम पक्षियों की बात करते हैं तो केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी अभयारण्य का वर्णन अतीव आवश्यक हो जाता है, जिसमें पाए जानेवाले पक्षियों को भारतीय डाक-टिकटों में भी प्रमुख स्थान दिया गया है।

डाक-टिकटों की दुनिया बहुत ही विचित्र एवं अद्भुत है। कितने ही रंग इन डाक-टिकटों में समाए हुए हैं। प्रकृति, संस्कृति, धर्म, देवी-देवता, संतमहात्मा, कला आदि के विभिन्न रूप डाकटिकटों में परिलक्षित होते हैं। पक्षियों की भी एक नयाब दुनिया इन डाक-टिकटों में समाई हुई है। ब्रिटिशकालीन भारत में पक्षियों पर एक भी डाक टिकट जारी नहीं हुआ था।

भारतीय डाक-टिकटों पर सर्वप्रथम दिखाई देनेवाला पक्षी संदेशवाहक कबूतर था। यह डाक-टिकट 01 अक्टूबर, 1954 को जारी किया गया था जो 2 आने व 4 आने मूल्य का था। वर्ष 1968 के अंत में चार पक्षियों पर 20 पैसे के डाक-टिकटों का सेट जारी किया गया था। वर्ष 1974 में 50 पैसे के डाक टिकट पर उड़ान भरते हुए डेमोइजेल क्रेन एंथ्रोपोइड्स कुंजा को दर्शाया गया था। जब हम पक्षियों की बात करते हैं तो केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी अभयारण्य का वर्णन अतीव आवश्यक हो जाता है। केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी अभयारण्य, भरतपुर में प्रवासी एवं अप्रवासी पक्षियों का अनोखा संसार है। भरतपुर केवलादेव (घना) राष्ट्रीय अभयारण्य ‘पक्षियों की नगरी' के नाम से विश्वभर में प्रसिद्ध है। यह स्थल विश्व की धरोहरों में अपना प्रमुख स्थान रखता है। वर्षभर यहाँ प्रवासी व अप्रवासी पक्षियों का ताँता लगा रहा है, किन्तु मुख्य रूप से यह शीतकालीन अप्रवासी पक्षियों के लिए प्रसिद्ध रहा है। केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान ‘घना पक्षी विहार' के नाम से भी जाना जाता है। यह अभयारण्य मुख्य रूप से जल-पक्षियों के लिए प्रसिद्ध है। पर्यटक परिपथ सुनहरा त्रिकोण (दिल्ली-आगरा-जयपुर) पर स्थित यह अभयारण्य पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है। यह अभयारण्य लगभग 29 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में फैला हुआ है। भरतपुर के नरेशों ने प्रारम्भ में इसे एक आखेट-स्थल के रूप में विकसित किया था। सन् 1964 ई. में इसे अभयारण्य एवं 1982 ई. में राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया। आगरा, मथुरा, फतेहपुर सीकरी से समीपता के