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भारतीय राजा-महाराजाओं की डाक-प्रणाली
August 26, 2018 • Navlekha Team

भारतीय महाराजाओं के द्वारा लंबे समय तक चलाई जाने वाली डाक- व्यवस्था ने भी चार चाँद लगाये। कई रियासतों ने तो शासकीय सुविधा के लिए ही डाक-सेवा शुरू की थी, जबकि बहुत- से राजा-महाराजाओं ने जनता के सरोकारों को केन्द्र में रखा। अंग्रेजों ने जब सन् 1954 में केन्द्रीय डाक-व्यवस्था की नींव रखी, तब भारत में 652 से अधिक रियासतों में डाक-प्रणालियाँ काम कर रही थीं। इनके एकीकरण में बहुत लंबा समय लगा। वास्तविकता यह है कि रजवाड़ों की डाक का भारतीय डाक के साथ वास्तविक एकीकरण हमारे पहले उप्रपधानमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल और पहले संचार मंत्री रफी अहमद किदवई के प्रयासों से संपन्न हो सका। इनके पूर्व दो अंग्रेज़ अफसरों- सर फैडिक होप तथा सर आर्थर ने भी इस दिशा में बहुत उल्लेखनीय प्रयास किए थे। रियासती डाक एकीकरण के प्रयास सन् 1892 से 1953-54 के बीच चलाने पड़े।

भारतीय डाक-व्यवस्था में राजा- महाराजाओं द्वारा स्थापित और लंबे समय तक चलती रही रियासती डाक बहुत महत्त्वपूर्ण कड़ी है। हमारे यहाँ कई राजामहाराजाओं के शौक अजीबोगरीब थे, पर कई ऐसे भी थे, जो आम जनता के हितों के लिए डाक-व्यवस्था चला रहे थे। इसके साथ जिला और अंग्रेज़ी डाक-व्यवस्था को एकसूत्र में पिरोकर मज़बूत नेटवर्क खड़ा करना कोई आसान काम नहीं था। तमाम राजाओं के अपने फोटोवाले डाक टिकट चल रहे थे। औरों से अलग दिखने के लिए कुछ राज्यों में डाकपेटियों के रंग भी अलग थे। पर इन सारे रंगों ने मिलकर भारतीय डाक-व्यवस्था को बहुत रंगीन बना दिया। राजा-महाराजाओं की डाकव्यवस्था को एकीकृत करने में बड़ी दिक्कत आयी। अंग्रेजों ने जमदरी या ज़िला डाक को अपने हितों में बनाए रखा था, पर रजवाड़ों की डाक-व्यवस्था के साथ ऐसा नहीं था। अंग्रेज़ इस मामले में बहुत धीमी गति और धैर्य के साथ चले और एक-एक राजा-महाराजा को पकड़कर भारतीय डाक-व्यवस्था की छतरी तले लाते रहे। यही कारण है कि सन् 1908 तक 635 राज्यों ने केन्द्रीय डाक प्रणाली अपना ली। मगर हैदराबाद, जयपुर, त्रावणकोर तथा ग्वालियर-जैसी बड़ी रियासतों के साथ कुल 17 राज्य फिर भी नयी व्यवस्था मेंशामिल नहीं हुए। इस तरह आज़ादी के बाद ही भारतीय डाक वास्तविक एकीकृत स्वरूप पा सकी। पर निज़ाम की डाक तो भारत के आजाद होने के बाद भी जारी रही थी।

। सन् 1886 में अंग्रेजों ने देशी रियासतों के डाक-प्रबंध को एकीकृत करने के बारे में गंभीरता से विचार किया और इसी के तहत सन् 1892 में डाक एकीकरण नीति घोषित की। तब देशी रियासतों में हैदराबाद, मैसूर, बड़ौदा, कश्मीर तथा ग्वालियर सबसे बड़ी मानी जाती थीं और अंग्रेजों ने इनके शासकों का वर्गीकरण 21 तोपों की सलामी पानेवाले के रूप में किया था। इस श्रेणी से नीचे के राज्यों में भोपाल, इंदौर, कोल्हापुर, त्रावणकोर, उदयपुर, रीवा, कोचीन, पटियाला, बहावलपुर, जयपुर, जोधपुर, बूंदी, बीकानेर, भरतपुर आते थे, जिन्हें 19 से 17 तोपों की सलामी दी जाती थी। देशी राजा-महाराजाओं में 148 ऐसे थे जिनके पास तोपें भी थी। इन राजाओं ने अपने राजकुमारों को अंग्रेजों से मुकाबले लायक बनाने के लिए सन् 1873 में अजमेर में मेयो कॉलेज स्थापित कराया था। अलवर, कोटा, इंदौर, रीवा, बीकानेर तथा अन्य राजाओं के द्वारा इसके लिए 10 लाख डॉलर की राशि प्रदान की गई थी। 260 एकड़ ज़मीन पर सफेद संगमरमर से बहुत सुंदर कॉलेज बना, जिसका प्रिंसिपल अंग्रेज़ था। यहाँ कई छात्रों के पास 1911 में निजी मोटर कारें भी थीं।

बहरहाल, तमाम प्रयासों के बाद 652 राजा-महाराजाओं में से सन् 1908 तक 635 की डाक सेवा का एक धारा में विलय कर दिया गया। बाकी बची 17 रियासतों में बुंदेलखण्ड की पन्ना और दतिया ने सन् 1921-22 में भारतीय डाक धारा में अपनी डाक-व्यवस्था का विलय कर दिया। पर हैदराबाद, ग्वालियर, जयपुर, त्रावणकोर, उदयपुर, छतरपुर, भोपाल, ओरछा, जूनागढ़ समेत कुल 15 रियासतें अड़ी रहीं। ये न तो डाक एकीकरण अभियान में शामिल हुईं, न ही इन्होंने कोई सन्धि की। इनमें से कुछ रियासतें तो डाक टिकट का उपयोग भी नहीं करती थीं, जबकि हैदराबाद, ग्वालियर, मैसूर, जयपुर, त्रावणकोर, भोपाल, ओरछा, जूनागढ़, जींद, नाभा, चम्बा, पटियाला, अलवर, कोटा, कोचीन, जोधपुर, बनारस, सुक्कर और लासवेला की रियासतों के अपने डाक टिकट थे। डाक टिकटों पर इलाकाई राजाओं की फोटो के साथ राज्य नाम छपते थे। पर बची रही रियासतों में ज्यादातर के पास मज़बूत डाक नेटवर्क नहीं था।

एकीकरण-संबंधी वार्ता को आगे बढ़ाने के लिए देशी रियासतों के साथ पहली वार्ता सन् 1883 में पटियाला में हुई। पर इसमें राजाओं का अहम् टकराता दिखा। डाक-सामग्री के आदान-प्रदान जैसी बातों पर उनकी सहमति थी। इस बाबत बात आगे बढ़ी तो ग्वालियर, जींद, चंबा, नाभा तथा फरीदकोट ने भी आदान-प्रदान संबंधी बात को मान लिया और सन् 1886 तक छह संधियाँ हो गयीं। यह और तय हुआ कि रजिस्ट्री पत्र, वीपीपी, पार्सल, भारतीय डाक दिशा-निर्देशों के तहत संचालित होंगे। इनके लिए अलग लेखा बनेगा और देशी रियासतें तथा भारत सरकार अपने-अपने हिस्से की लागत वहन करेंगी। यह भी तय किया गया कि रेलवे स्टेशन या कैंट इलाकों को छोड़कर कहीं भी कोई केन्द्रीय डाकघर बिना दरबार की आज्ञा के नहीं खोला जाएगा तथा मनीऑर्डर के लिए अलग लेखा शीर्ष होगा। सन् 1886 में देशी रियासतों के डाक-प्रबंध को एकीकृत करने के विचार को दक्षिण में मैसूर महाराजा चिक देवराज वाडियार का समर्थन मिला और उन्होंने अपने राज्य की अरसे से चली आ रही व्यवस्था को भारतीय डाक के हवाले कर दिया। कश्मीर के महाराजा गुलाब सिंह भी अग्रणी रहे। कई दौर कीवार्ता और संधि-प्रस्ताव के बाद डाक के आदान-प्रदान के लिए कई रियासतें तैयार हो गयीं।

सन् 1894 में नन्दगाँव तथा बामरा (मध्यप्रांत) और पडुकोटक (मद्रास प्रेसीडेंसी) की डाक-व्यवस्था भारतीय डाकघर को सौंप दी गयी। बाद में कच्छ, काठियावाड़ तथा बीकानेर आदि रियासतें भी तैयार हुईं। इन्दौर के होल्कर ने सन् 1907 में नयी व्यवस्था में शामिल होने के लिए अपनी रज़ामंदी दी। पर कुछ बड़ी रियासतों को इस काम के लिए तैयार करने में काफी दिनों तक प्रयास करने पड़े। इसी बाबत बटलर कमेटी भी बनाई गई थी। सन् 1926 में रियासती डाक से जुड़े तमाम पहलुओं का नये सिरे से अध्ययन करके बी.एन. मित्रा ने राजनीतिक विभाग को डाक वित्त पर अपनी रिपोर्ट सौंपी। इसके बाद डेविडसन कमेटी भी बनी।

बहरहाल, अंग्रेजों ने एक सीमा के तहत भारी रजवाड़ों को उनके उपयोग के लिए सर्विस डाक टिकट भी काफ़ी समय तक मुफ्त दिया। वैसे इस फैसले पर कई कमेटियों को कड़ी आपत्ति थी। सन् 1931 में डाक-तार विभाग की एक कमेटी ने रियासतों को सर्विस डाक टिकट-जैसी रियायत न देने को कहा। भारतीय डाक-तार विभाग की सन् 1938-39 की रिपोर्ट के मुताबिक उक्त जिन राज्यों को मुफ्त सर्विस- टिकट दिए जा रहे थे, उसे देखकर उन राज्यों के आकार को आसानी से समझा जा सकता है।

हैदराबाद के निज़ाम आखिर तक नहीं माने। बेहद संपन्न हैदराबाद ने आखिर तक डाक-एकीकरण में कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी। निज़ाम तो यहाँ तक चाहते थे कि उनके राज में विदेशी डाक का प्रबंध भी केन्द्रीय डाक की बजाय उनकी अपनी ही एजेंसी करे। सन् 1882 में हालांकि निजाम पत्रों के आदान-प्रदान के लिए तैयार थे, पर उनकी यह शर्त थी कि हैदराबाद राज्य में खुले केन्द्रीय डाकघर बंद किए जाएँ; क्योंकि वे रियासत के डाक-राजस्व को हानि पहुँचा रहे हैं। एकीकरण-विरोधी निज़ाम की मंशा यह थी कि हैदराबाद रियासत की परिधि में केन्द्रीय डाक का कोई अस्तित्व न रहे, पर अंग्रेज़ इस बात के लिए एकदम तैयार नहीं हुए। निज़ाम तो भारत की आज़ादी के बाद भी नहीं मान रहे थे।

सरदार पटेल की इच्छाशक्ति के चलते हैदराबाद का एकीकरण हो सका। हैदराबाद के बारे में यह बात उल्लेखनीय है कि यह सबसे धनी और सन् 1910-11 में करीब 25 लाख डॉलर की सालाना आयवाली रियासत थी। निज़ाम हैदराबाद के पास निजी 400 मोटरकारों का काफिला और लंबा- चौड़ा हरम भी था। उस जमाने में इतनी मोटरें तमाम ज़िलों को मिलाकर भी नहीं थीं। निज़ाम हैदराबाद को विदेशी सामानों से इतना लगाव था कि उन्होंने लंदन में केर एस्टुअर्ड एण्ड कम्पनी को अपना एजेंट ही नियुक्त कर दिया था।

भारतीय डाक-तार व्यवस्था का असली एकीकरण आज़ादी मिलने के बाद ही हो सका। यह एकीकरण न होता तो कितनी अजीबोगरीब स्थिति बनती और अराजकता रहती, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। भारत को आजादी मिलने तक कई राज्य अलग डाक-व्यवस्था चला रहे थे। आज़ादी के पहले कुछ राजाओं ने तो डाक-संचालन को मलाईदार मानकर इस विभाग को वापस लेने की मांग कर दी। उनका तर्क यह था कि वे भारतीय डाकव्यवस्था से बहुत असंतुष्ट हैं और इसे खुद चलाना चाहते हैं। कुछ राज्य और रियासतें, अपने राज्य की सीमा में मुफ्त में डाकसंचालन तथा मुफ्त सेवा-टिकट जैसी मांगें रख रहे थे। जाहिर है कि यह कठिन समय था। आज़ादी के बाद वी.टी. कृष्णमाचारी की अध्यक्षता में भारतीय राज्य वित्त जाँच समिति का गठन किया गया। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में बहुत साफगोई से राय दी। कि टेलीफोन तथा डाक-तार विभाग रियासतों के नियंत्रण से लेकर केन्द्र सरकार के अधीन किए जायें। इसी के तहत 01 अप्रैल, 1950 तक रियासती डाक प्रणाली का भारतीय डाक-तार विभाग में विलय करने का फैसला लिया गया। डाकएकीकरण में पहले संचार मंत्री रफ़ी अहमद किदवई की खास भूमिका रही है। रियासती डाककर्मियों को डाक विभाग में खपाया गया। निज़ाम विलय की आखिरी कड़ी थे। हैदराबाद डाक-तार प्रणाली का एकीकरण सन् 1953-54 में हुआ और उसी साल भारतीय डाक वास्तव में भारतीय डाक का स्वरूप ले सकी।

देशी रियासतों में कई डाक-प्रणालियाँ बेहतर काम कर रही थीं और जनता की मदद भी कर रही थीं। पर उनका दायरा बहुत छोटा था और उत्पाद सीमित थे। फिर भी उनकी ऐतिहासिक भूमिका को खारिज नहीं किया जा सकता। हैदराबाद की डाकप्रणाली बेहतर मानी जाती थी और उसके पास एक मज़बूत तंत्र भी था। इसके अलावा अंग्रेजों की तर्ज पर ही निजाम ने एक लावारिसी डाक (डेड लेटर ऑफिर) की प्रणाली भी शुरू की थी। निज़ाम ने बम्बई से हैदराबाद का डाक संपर्क सन् 1874 से शुरू करा दिया था, जबकि वहाँ की देहात की डाक-सेवाएँ भी बेहतर थीं। निज़ाम ने सन् 1872 में अपने राज्य में मनीऑर्डर की भी शुरूआत करा दी थी और सन् 1875 में रेलवे मेल सेवा भी शुरू हो गई थी। सन् 1923 से डाकघरों में बचत- खाते भी शुरू हो गये। सन् 1953-54 में जब हैदराबाद डाक तंत्र का एकीकरण हुआ, उस समय वहाँ 1,719 रियासती और 44 केन्द्रीय डाकघर थे।

मैसूर राज्य

मैसूर महाराजा की डाक-व्यवस्था भी काफ़ी अच्छी थी और उसे देश की सबसे सस्ती और बेहतरीन प्रणालियों में से एक माना जाता था। पर सन् 1886 में एकीकरण के लिए तैयार होने के कुछ सालों में ही मैसूर राज्य के डाकघरों की जगह 340 केन्द्रीय डाकघर खुले और 770 हरकारे सरकारी सेवा से बाहर कर दिए गये। हालांकि नयी व्यवस्था में भी मैसूर रियासत की सरकारी डाक को उनकी सीमा में मुफ्त ले जाने की छूट प्रदान की गई थी।

मैसूर रियासत का डाक-प्रबंध व्यवस्थित था और कस्बों में 173 तथा गाँवों में 253 डाकघर थे। ग्रामीण डाकघरों का जिम्मा स्कूल-अध्यापकों पर था और उन्हें इस काम के लिए 1-3 रुपये भत्ता अलग से मिलता था। इस राज्य में डाक- तंत्र को वास्तविक दिशा राजा चिक्का देवराज (1673-1704) के कार्यकाल में मिली। तब कर्नाटक में दुनिया की सबसे सस्ती डाक प्रणाली सामने आई जिसे हैदर अली (1761-1782) ने और मज़बूत बनाया।

बड़ौदा राज्य हालांकि सबसे बड़े और सबसे संपन्न देशी रियासतों में माना जाता था, पर आम जनता की सेवा के लिए इस रियासत में कोई नियमित डाक सेवा का अस्तित्व नहीं था। सरकारी गायकवाड़ डाक हरकारों या सवारों द्वारा प्रशासनिक कामों के लिए थी और इनके द्वारा ही रियासती सीमा के बाहर भी डाक भेजी जाती थी। लेकिन आम जनता को अपनी डाक के लिए खुद का इंतजाम करना पड़ता था। हालांकि सन् 1794 में बम्बई जीपीओ की स्थापना के बाद बम्बई-सूरत के बीच सन् 1796 में डाक-सेवा शुरू हो गई थी और कई जगहों पर इसका विस्तार हुआ। बड़ौदा में डाकघर खोलने में भी गायकवाड़-सरकार से अंग्रेजों को काफी प्रयास करना पड़ा। काफ़ी लंबा संवाद और पत्राचार का सिलसिला चलने के बाद सन् 1863 में पाटन में डाकघर खोलने पर रजामंदी दी गई। पाटन सिंध के रास्ते में होने के नाते काफी उपयोगी था। पर रियासत की इच्छा थी कि स्थानीय प्राधिकारियों को संबंधित भूमि और भवन का पूरा कर भुगतान किया जाए और रियासती प्रशासन के पत्रों को बड़ौदा तथा अन्य स्थलों पर । मुफ्त में ले जाया जाए। कुछ और शर्ते भी थीं जिन्हें अंग्रेज़-अधिकारियों ने मान लिया। राज्य के पत्राचार के मामले में अंग्रेज़- अधिकारियों ने डाक-टिकटों के मूल्यों की वापसी की बात मान ली और यह भी कि सरकारी पत्राचार का शीघ्र पहुँचाना सुनिश्चित किया जाएगा। डाकघरों के लिए रियासत ने भूमि उपलब्ध करायी और हरकारों के लिए झोपड़ियों तथा सराय का इंतज़ाम कराया। सन् 1883 में बड़ौदा राज्य में डाकघरों की कुल संख्या 54 थी और लेटरबाक्स 165 थे। सन् 1939 तक डाकघरों की संख्या बढ़कर 419 हो गई और लेटरबॉक्स 2,203 हो गये। राज्य में सन् 1880 में 32 मेल-लाइनें थीं जो सन् 1880 तक 43 हो गयीं। पत्रों को उस समय तक पैदल हरकारों, घोड़ा-डाक, ऊँट-डाक और नावों के द्वारा ले जाया जाता था। सन् 1882 से रेलवे डाक सेवा भी सीमित इलाके में शुरू हुई। इसी प्रकार कई रियासती डाक प्रणालियाँ काम कर रही थीं। कई तो अंग्रेजों की सेवा को भी मात दे रही थीं। नवाब अर्काट की सेवा की तारीफ़ खुद अंग्रेज़ अफ़सर कर चुके थे। त्रावणकोर में भी ग्रामीण डाकघर, स्कूल-अध्यापक चलाते थे और वे कुनैन की गोली भी बेचते । इसी तरह काफ़ी धनी रियासत ग्वालियर पास भी अपनी व्यवस्थित डाक-प्रणाली । मगर यहाँ सन् 1885 तक आम जनता लिए डाकघर नहीं था। सन् 1885 में 65 डाकघर खुले जिनकी संख्या सन् 1905 तक 139 हो गयी। इस राज्य का सर्विस स्टैम्प सन् 1895 में ही शुरू हो गया , जिस पर हिंदी और अंग्रेजी में ग्वालियर' शब्द अंकित था। राज्य में 20 रुपये से अधिक लेनदेन पर एक आने का रेवेन्यू टिकट लगाना अनिवार्य था। ऐसे ही हर राज्य की अपनी डाक-व्यवस्था थी जिसने इलाकाई समीकरणों के आलोक में डाक-सेवाएँ शुरू की थीं। भारतीय डाक को इनके अनुभवों से खासी मदद मिली।