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भारत में मुद्रा की उत्पत्ति एवं विकास-गाथा
August 25, 2018 • Navlekha Team

प्राचीन काल से ही भारत एक आध्यात्मिक, सांस्कृतिक चेतना सम्पन्न सुसमृद्ध राष्ट्र रहा भारतीय इतिहास के स्रोतों के रूप साहित्य और पुरातत्त्व के साथ-साथ मौद्रिक साक्ष्य भी यहाँ के इतिहास उजागर करने में पूर्णरूपेण समर्थ इतिहास की एक शाखा, जो प्राचीन मुहरों एवं सिक्कों का अध्ययन करवाती मुद्राशास्त्र या नुमिस्मेटिक्स कहलाती भारतीय मुद्राशास्त्र एक महत्त्वपूर्ण स्रोत रूप में तत्कालीन सांस्कृतिक जीवनधार्मिक आदर्श, जीवन-मूल्य, आर्थिकसामाजिक-राजनैतिक दशाओं का ही नहींवरन् हमारी कलाओं, संगीत एवं काव्य विकास और अवस्थाओं की वाङ्मय व्याख्या देकर हमें अभिभूत कर देता है।यहाँ विभिन्न कालों में अनेक नृपति हुए हैं।जिनकी साहित्यिक और कलापक्षीय अभिरुचियाँ एवं संगीत से अप्रतिम प्रेमउनकी मुद्राओं पर भी अंकित मिलता है। मुद्राएँ स्वयमेव तो मुद्राशास्त्रीय कला सर्वोत्कृष्ट उदाहरण हैं ही, साथ-साथ प्राचीन भारतीय कला एवं प्रतिमाशास्त्र के अध्ययन की दृष्टि से भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं हैं।

भारत में मुद्राशास्त्र के इतिहास को जानने से पूर्व यह जानना नितांत आवश्यक है कि किन सामाजिक-आर्थिक परिप्रेक्ष्य एवं परिस्थितियों में मुद्रा की आवश्यकता महसूस की गई एवं कैसे मुद्रा की उत्पत्ति हुई। क्योंकि जैसा कि चाल्र्स फर्थ (1857-1936) ने लिखा है, "History is not only a branch of learning but it is a pure philosophy which represents knowledge in the form of daily life of man,' मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है उसके विकास की अपनी गाथा है। हमें मुद्रा के आविर्भाव को भी उसी विकास-क्रम में देखना होगा। इतिहास को पारिभाषित करते हुए ई.जे. रैप्सन (1861-1937) ने सत्य ही कहा है, 'इतिहास घटनाओं या विचारों की उन्नति का एक सुसम्बद्ध विवरण है।' अतः हम भारत में मुद्रा की उत्पत्ति को भी पृथक् रूप से नहीं देख सकते हैं। मानव के समस्त सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के विकास-क्रम के सन्दर्भ में ही इसे देखा जा सकता है।

ऐसा माना जाता है कि अत्यन्त प्राचीन काल में मानव अत्यन्त सरल एवं जंगली जीवन व्यतीत करता था। आखेट द्वारा अपना भरण-पोषण करता था। उसकी आवश्यकताएँ अत्यन्त सीमित थीं तथा वह भ्रमणशील जीवन जीता था। कालान्तर में उसमें शनैः-शनैः सामूहिकता की भावना का उदय हुआ और परिवार बनने लगे। आदिम जातियों को अपने परिवार के निर्वाह हेतु उत्पादन एवं संग्रह की आवश्यकता महसूस होने लगी। अब केवल मांसभक्षण एवं पेड़ों की छालों से शरीर ढकना ही काफ़ी न था वरन् सुरक्षा के प्रश्न ने जत्थे या समूह का रूप लिया। बढ़ती आवश्यकताओं के कारण स्थाई निवास और परस्पर सम्पर्क बढ़ा। अनुसंधानुसार ये आदिम जत्थे कुनबे के रूप में नदी किनारे एवं गिरि-कंदराओं में बसने लगे जिससे नदीघाटियों में शैशवकालीन सभ्यताओं की शुरूआत हुई। भोजन के निश्चित स्रोत की अनिवार्यता के चलते आखेटी मानव कृषि की ओर उन्मुख हुआ। इस प्रकार मानव जीवन ने एक नवीन रूप धारण किया। सभ्यता के उस शैशवकाल में भी हम कार्य-विभाजन को देख सकते है, जैसे- खेती से अन्न पैदा करना, आवास बनाना, कपास से वस्त्र बनाना, शस्त्र बनाना आदि। इस प्रकार के कार्य विभाजन से समाज में सुविधा बढ़ी। साथ ही विभिन्न समूह परस्पर सम्पर्क में आए तो स्वाभाविक तौर पर एक दूसरे की वस्तुओं के प्रति आकृष्ट हुए। तब उक्त दोनों ही कारणों से लोगों में परस्पर वस्तुओं के आदान-प्रदान की भावना का उदय हुआ। अर्थात् किसी वस्तु की आवश्यकता या इच्छा होने पर अपनी वस्तु देकर अन्य से इच्छित वस्तु लेने का विचार। इस प्रकार समाज में वस्तु-विनिमय प्रणाली/बदलौन की प्रथा या बार्टर-सिस्टम का उद्भव हुआ। समय के साथ इस प्रथा ने समाज में एक व्यवस्थित एवं व्यावसायिक रूप धारण कर लिया। मुद्राशास्त्रवेत्ता इसे ही सिक्कों या मुद्रा की उत्पत्ति का प्रथम सोपान मानते हैं। आज भी नगर और गाँवों में कई बार इस वस्तु-विनिमय को देखा जा सकता है जैसे पुरानी साड़ियाँ देकर नये बरतन खरीदना।

यद्यपि इस प्रणाली में मनुष्य के कई कार्य पूरे होते रहे होंगे, तथापि मानव समाज ने अन्य प्रणालियाँ खोजीं। इसका मुख्य कारण यह था कि उसमें अनेक व्यावहारिक कठिनाइयाँ आने लगीं। यह प्रश्न उठा कि बेचने और खरीदनेवाले की वस्तुओं का पारस्परिक मूल्य किस प्रकार निर्धारित किया जाए। उदाहरण के लिए गज वस्त्र और दस सेर अनाज बराबर हैकम है या ज्यादा है? इसका निर्णय करना कठिन था। दूसरा महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह कि दोनों वस्तुओं का आनुपातिक परिमाण कैसे निश्चित किया जाए? तीसरे यदि किसी वस्तु के टुकड़े करना सम्भव न हो तो सारी वस्तु खरीदनी पड़ती थी और यदि किसी तरह टुकड़े कर भी दिए जायें तो आवश्यकतावश एक भाग खरीदने के बाद शेष बची वस्तु की क्या दशा होगी? एक अन्य समस्या यह थी कि जब दो वस्तुओं के मूल्यों में एक का विक्रय-मूल्य अधिक होता था तो उसका विनिमय नहीं हो पाता था। इन परिस्थितियों में लोगों ने तीसरी वस्तु के माध्यम से काम चलाया जिसे विनिमय का माध्यम (मीडियम ऑफ़ एक्सचेंज) कहते है। वही माध्यम विक्रयकार्य में मानक या स्टैण्डर्ड माना जाता था।

समय-समय पर कई अलग वस्तुओं को इस नवीन विनिमय-प्रणाली में अन्य दूसरी वस्तुओं की अपेक्षा वरीयता प्राप्त हुई और उन्हें अन्य तत्कालीन वस्तुओं की अपेक्षा अधिक मूल्यवान् माना जाने लगा। जैसे प्रस्तर-युग में हथियार या चमड़ा भी विनिमय के साधन थे तो नवपाषाणकालीन कृषि-युग तक आते-आते पशुओं को वस्तु-विनिमय का माध्यम बनाया गया।