Navlekha.page
हिंदुस्तानी फिल्मों में रेल
August 27, 2018 • Navlekha Team

 

राज कपूर के पास ‘रिश्वत' नामक एक कहानी थी, जिसकी पटकथा वे विजय तेंडुलकर से लिखवाना चाहते थे और इस विषय में उन दोनों की कुछ बैठकें हुई थीं। कहानी का नायक सेवानिवृत्त शिक्षक है और अपने दोस्तों के आग्रह पर अपने केंद्रीय मंत्री पुत्र से मिलने दिल्ली जाना स्वीकार करता है। पूरी फ़िल्म रेलगाड़ी के एक डिब्बे में घटित होती है। भारतीय रेल का एक डिब्बा देश की विविधता का प्रतीक है, जिसमें विभिन्न धर्मों और भाषाओं के लोग साथ-साथ यात्रा करते हैं। डिब्बे में बहुत भीड़ है, परंतु जैसे ही सफ़र शुरू होता है, सबको कहीं-नकहीं स्थान मिल जाता है। सेवानिवृत्त शिक्षक, यात्रियों की बातें सुनता है और महसूस करता है कि यह डिब्बा रेल की पटरियों पर चलता हुआ भारत है। हर समय भारतीय रेलों में यात्रियों की संख्या न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया की जनसंख्या के बराबर है। यात्रियों के अनुभवों से देश में अन्याय और असमानता-आधारित समाज की जानकारी मिलती है। राजकपूर के मन में यह बात थी कि उनकी फ़िल्म ‘जागते रहो' की तरह देश की विसंगतियों और विषमताओं के बीच आम आदमी के कष्ट की कहानी होगी। बहरहाल उनकी मृत्यु के कारण यह फिल्म नहीं बनी और श्री विजय तेंडुलकर भी नहीं रहे।

सिनेमा और रेल के सम्बन्ध तो सिनेमा के जन्म के साथ ही प्रारम्भ हो गए थे; क्योंकि लुमियर-बंधुओं की प्रारम्भिक फ़िल्मों में एक लघु फ़िल्म में रेलगाड़ी के प्लेटफॉर्म पर रुकने और यात्रियों के चढ़ने- उतरने के दृश्य थे। रेल-डकैती पर अनेक फ़िल्में बनी हैं। भारतीय सिनेमा में भी रेल- डकैती के दृश्य रखे गए हैं। दिलीप कुमार की ‘गंगा-जमुना' में रेल-डकैती का दृश्य बहुत रोमांचक बन पड़ा था और 'शोले' में भी उसी तर्जे का एक दृश्य था। इन दोनों फ़िल्मों में रेल-डकैती के दृश्य के लिए विदेशी विशेषज्ञ बुलाए गए थे। बलदेवराज चोपड़ा ने अमेरिकी फ़िल्म 'द बर्निंग इन्फरनो' से प्रेरित होकर 'द बर्निग ट्रेन' बनाई थी, जिसके लिए भारतीय रेल ने उन्हें भरपूर सहायता दी थी, परन्तु शूटिंग में हुए नुकसान की भरपाई नहीं होने के कारण सरकार ने फ़िल्म-शूटिंग के लिए रेल सेवा दरों को बढ़ा दिया है।

बोनी कपूर ने अपनी फिल्म ‘रूप की रानी, चोरों का राजा' में रेल-डकैती के दृश्य । के लिए हैलिकॉप्टर इत्यादि की मदद ली और अत्यंत रोमांचक दृश्य बन पड़ा। यह अजीब बात है कि फिल्मकार रेल-डकैती के दृश्यों में रुचि लेते हैं, जबकि ट्रेन के डिब्बे में मानवीय संवेदनाओं के दृश्यों पर उनका ध्यान नहीं है। एक अमेरिकी फ़िल्म में रेल के डिब्बे में दो गुण्डे चाकू दिखाकर महिला यात्रियों के गले के आभूषण छीनते हैं और पचास यात्रियों में कोई प्रतिरोध नहीं करता, परन्तु एक सेना का जवान जिसके हाथ में प्लास्टर बँधा है, वह उसी प्लास्टर लगे हाथ से गुण्डों की पिटाई कर देता है। स्टेशन पर ट्रेन रुकते ही पंचनामे इत्यादि की झंझटों से बचने के लिए यात्री, डब्बे से भाग जाते हैं और इस भाग-दौड़ में एक वृद्ध नीचे गिर जाता है, जिसकी सहायता वही सैनिक करता है और आम आदमियों के टुच्चेपन पर दुःख प्रकट करता है। एक फ़िल्म में रेल के कूपे में तलाकशुदा पति-पत्नी वर्षों बाद मिलते हैं और उनके समान सरनेम के कारण उन्हें यह कूपा दिया जाता है। ज्ञातव्य है कि कूपे में केवल दो यात्री ही बैठ सकते हैं। लंबी यात्रा के दरमियान उनका टूटा रिश्ता जुड़ जाता है। रेल में मिलना और बिछड़ना अनेक मानवीय सन्बन्धों पर प्रकाश डालता है। दरअसल यात्राएँ अत्यंत शिक्षाप्रद होती हैं। राज कपूर की ‘मेरा नाम जोकर' के पहले भाग में रेल का अभूतपूर्व दृश्य है, जब छुट्टियों के बाद छात्र लौटते हैं। और एक स्थानीय छात्र हर डिब्बे में अपने साथ पढ़नेवालों को फूल देता है और स्टेशन पर उसकी प्रिय शिक्षिका के लिए वह अपनी टोपी के नीचे एक गुलाब का फूल लाया है। पूरा दृश्य ही एक कविता की तरह है, परन्तु राज कपूर की 'राम तेरी गंगा मैली' के रेल दृश्य में पहाड़न भूखी-प्यासी है और उसका नन्हा शिशु भी दूध के लिए रो रहा है, तब रेल के चलने से उत्पन्न रिद्म पर एक गीत है, 'मैं जानू मेरा राजदुलारा भूखा है, दूध कहाँ से लाऊँ, आंचल सूखा है, अपनी आँख में आँसू लेकर कैसे कहूँ चुप हो जा, हो सके तो सो जा मुन्ने हो सके तो सो जा...'

रेल की रिद्म पर लताजी की मधुर आवाज़ में गाया यह गीत एक अद्भुत प्रभाव पैदा करता है। भारतीय सिनेमा में अनेक फ़िल्मों में रेल के दृश्य हैं और इस लेख की सीमा में विस्तार से लिखना सम्भव नहीं है।