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जल पर तैरते डीग के मनोहारी महल
August 27, 2018 • Navlekha Team

 

राजस्थान प्रांत के भरतपुर ज़िले का एक कस्बा है डीग। यह भरतपुर से लगभग 34 किमी. दूर 25°47 उत्तरी अक्षांश तथा 77°32 पूर्वी देशान्तर में स्थित है। अल्पज्ञात होने पर भी यह कस्बा अपने कलात्मक सौन्दर्य, जल-व्यवस्था तथा उद्यानों से सुसज्जित महलों के कारण बहुत ही सुरम्य एवं मनोहारी स्थल है। स्कन्दपुराण तथा भागवतमाहात्म्य में दीर्घ या दीर्घापुर के रूप में इसका उल्लेख है। सम्भवतः यही ‘दीर्घ कालान्तर में ‘डीग' नाम से संबोधित किया जाने लगा। ब्रज की चौरासी-क्रोशीय परिक्रमा में आनेवाला डीग भगवान् कृष्ण की लीलाओं का केन्द्र रहा है, इसे ‘लाठवन' भी कहा जाता है। यह अलवर, मथुरा, दिल्ली, भरतपुर तथा जयपुर आदि नगरों से राष्ट्रीय राजमार्गों द्वारा जुड़ा है।

भरतपुर के जाट-शासक बदनसिंह (1722-1756) ने डीग को भरतपुर राज्य की पहली राजधानी बनाया था। यह कभी भरतपुर के जाट-शासकों का ग्रीष्मकालीन आवास रहा करता था। यह छोटी-सी धार्मिक एवं ऐतिहासिक नगरी अपनी बेजोड़ किलेबंदी, अत्यधिक सुंदर बगीचों एवं भव्य महलों के कारण प्रसिद्ध है।

महाराज बदनसिंह ने इस स्थान पर किला व महल निर्मित करवाए जो उनके सौन्दर्य-बोध का प्रतीक है। बदनसिंह द्वारा 1722 ई. में महल का निर्माण करवायागया जो ‘पुराना महल' के नाम से जाना जाता है। वर्तमान में यह महल सरकारी कार्यालय का स्थान ले चुका है। डीग के किले का इतिहास अत्यन्त रोचक है। थून, जाटौली तथा अन्य गढ़ियों के पतन से बदनसिंह के भरतपुर राज्य का उदय हुआ । 23 नवम्बर, 1722 ई. को थून व जाटौली के पतन के पश्चात् औपचारिक रूप बदनसिंह ने स्वयं को जयपुर दरबार का निष्ठावान् सामंत बना लिया। इसी के परिणामस्वरूप सवाई जयसिंह ने बदनसिंह ‘ब्रजराज' की उपाधि तथा नगाड़ा, निशान व पञ्चरंगी झण्डे के प्रयोग की अनुमति प्रदान की।

बदनसिंह ने युद्ध करके राज्य–विस्तार की अपेक्षा शान्ति और राजनीतिक कौशल से काम किया। उन्होंने डीग और भरतपुर के अजेय दुर्ग और सुंदर महलों का निर्माण करवाया। निरक्षर होने के पश्चात् भी बदनसिंह का सौन्दर्य-बोध आश्चर्यजनक था। इन सुंदर उद्यान व प्रासादों की भव्य रूपरेखा उन्होंने ही रची थी। बदनसिंह और सूरजमल ने आगरा व दिल्ली से रोज़गार की तलाश में आनेवाले श्रेष्ठ कारीगरों को रोजगार प्रदान किया। उन्होंने कारीगरों तालाब बनाने, ईंटें पकाने, घास के सुंदर मैदान विकसित करने एवं फव्वारे बनानेवालों का काम दिया।

बदनसिंह के पुत्र महाराजा ब्रजेन्द्र सूरजमल बहादुर (1756-1767) ने सन् 1763 तक डीग के प्रसिद्ध भवनों का निर्माण कराया। प्रशासनिक मुख्यालय के रूप में उन्होंने भरतपुर को अधिक महत्त्व दिया, किन्तु डीग की महत्ता स्थापित करने के लिए डीग को दूसरी राजधानी के रूप में स्थान दिया। फलस्वरूप डीग और अधिक आकर्षक तथा समृद्ध होता चला गया। प्रायः ‘जाट-शैली' से विभूषित किए जानेवाले डीग के स्थापत्य का आकलन उसके महलों व भवनों से किया जाता है। डीग की स्थापत्य कला को किन्हीं विशिष्ट चरणों में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता, वरन् इनके निर्माण में विभिन्न शासकों की व्यक्तिगत भिन्नता दृष्टिगोचर होती है। जहाँ एक ओर बदनसिंह के द्वारा निर्मित पुराना महल विशालता, कम संतुलन, आंतरिक भाग में कम आकर्षण एवं अपेक्षाकृत कम कलात्मक तोड़े व स्तम्भों की विशिष्टता लिए हुए है, वहीं सूरजमल द्वारा निर्मित भवन अपने विभिन्न अवयवों में सामञ्जस्य व आनुपातिक संतुलन व पाषाण पर उत्कीर्णन व दोहरी छत-व्यवस्था द्वारा आकर्षक बन पड़े हैं। डीग स्थापत्य शैली सीधे शहतीरोंवाली शैली है, फिर भी कई उदाहरणों में अनुपाकार शैली का भी प्रयोग हुआ है। अधिकतर मेहराब, स्तम्भों से निकलती अनुकृतियों के जुड़ने से बने हैं। डीग के महलों में वानस्पतिक अलंकरणों को महत्त्व दिया गया है।

पुराने महल में कतिपय धुंधली पड़ चुकी चित्रकारी है जिनमें अरबी-शैली की चित्रकारी के अतिरिक्त गज, अश्वों के साथ पौराणिक गाथाओं को अंकित किया गया है। अलंकरण के रूप में फूल-पत्तियों को विभिन्न रूपों में प्रयुक्त किया गया है। इनका प्रयोग पालकीनुमा छतों की मुंडेरों, मेहराबों, तोडो व फव्वारों में किया गया है। इनके सौन्दर्य को शिल्पकार ने अपने शिल्प के माध्यम से बखूबी प्रदर्शित किया है। अन्य अलंकरण प्रारूपों में रूप में छद्म ताखों, वर्ग, आयत, अलंकृत छत, फलदान, इत्रदान, मदिरादान आदि भी प्रयुक्त किए गए हैं। मेहराबों के शीर्ष पर तथा छतों की नीचे की किनारियों पर पूर्ण विकसित कमल या अंदर की ओर मुड़ी पंखुड़ियोंवाले कमल सुसज्जित है।

डीग उद्यान, मुग़ल चारबाग शैली के सदृश्य है जिसमें नहर-प्रणालियों द्वारा वर्गाकार भूखण्ड को चार समान भागों में विभाजित किया गया है। यह नहर भूखण्ड के मध्य में एक दूसरे से मिलती है। जल द्वारा सौन्दर्य उत्पन्न करने में वास्तुकारों ने सफलता प्राप्त की है। यहाँ लगभग 500 फव्वारे हैं जो प्रायः किसी-न-किसी विशिष्ट प्रकार के स्वरूप धारण किए हैं तथा इनसे निकलनेवाला जल खिले पुष्प का स्वरूप ग्रहण कर लेता है।

डीग के महलों का योजना-विन्यास वर्गाकार उद्यान के चार कोणों पर स्थित चार इमारतों के रूप में था। पूर्व व पश्चिम में रूपसागर व गोपाल सागर नामक विशाल सरोवर है। पूर्व में केशव भवन, पश्चिम में गोपाल भवन, उत्तर में नन्द भवन तथा दक्षिण में किशन भवन है। इन महलों के नाम स्पष्टतः ब्रज के पौराणिक महानायक श्रीकृष्ण के प्रति जाट-शासकों की भक्ति के परिचायक हैं। गोपाल भवन के उत्तरी व दक्षिणी छोर पर क्रमशः सावन भवन और भादो भवन है। किशन भवन से लगा सूरज भवन व हरदेव भवन है तथा उत्तरी छोर पर मुख्य प्रवेश-द्वार सिंहपोल है, जो कलात्मक फूल-पत्तियों के पञ्च अलंकरण से सुसज्जित है। इसके अतिरिक्त दक्षिणपश्चिम में नंगा द्वार तथा उत्तर-पूर्व में सूरजद्वार है।

गोपाल भवन

अपनी विशालता व उत्कृष्ट वास्तुशिल्प के कारण गोपाल भवन सर्वोत्कृष्ट भवन है। महाराजा सूरजमल ने इसका निर्माण 1756-63 ई. में करवाया था। इसमें शाहजहाँ के महलों का लालित्य और राजपूत-वास्तुकला के अपेक्षाकृत दृढ़तर स्वरूप का मेल है, जो आधुनिक जीवन की सुविधाओं के लिए राजपुताना के पूर्ववर्ती दुर्ग-प्रासादों की अपेक्षा अधिकअनुकूल है। कल्पना की विशालता व बारीकियों के सौन्दर्य की दृष्टि से इसका जोड़ मिलना मुश्किल है। गोपाल भवन लाल पाषाण से निर्मित है जिसकी भित्तियों के मध्य निर्मित झरोखे अपने कलात्मक सौन्दर्य के कारण अत्यन्त मनमोहक प्रतीत होते हैं। आंतरिक भित्तियों पर भी आकर्षक कारीगरी की गई है। जे.ए. देवनिश ने इसमें बने आलों की नक्काशी की सराहना करते हुए लिखा है, 'इन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि मानो यह उद्यान की सुंदर छतरियों का लघु रूप हो।' यह भवन मुख्य रूप से तीन भागों में बँटा है। मुख्य कक्ष विशाल एवं एक मंज़िला है। मध्यवर्ती भाग दो मंजिला तथा पार्श्ववर्ती भाग चार मंज़िला है। पार्श्व भाग में दो आयताकार भूतलीय कक्ष हैं जिनका प्रयोग गर्मी में ठंढक पाने व मछली के शिकार हेतु किया जाता था। कलात्मक उत्कीर्णन व मेहराबों से सुसज्जित इस भवन के सामने 23x16x16x76 वर्गमीटर का एक राजकीय स्वागत कक्ष है। गोपाल भवन के ठीक सामने पन्द्रह फव्वारों से युक्त एक कुंड है जो दोनों ओर नहर-प्रणाली से जुड़ा । इस भवन के सामने ही एक अत्यन्त सुन्दर, संगमरमरी झूला है। इसकी चौकी पर पत्थर की पच्चीकारी की गई है जिस पर 1630-31 ई. का एक फ़ारसी लेख है। गोपाल भवन का पश्चिमी बाह्य भाग सर्वाधिक अभीष्ट है जो जल में से उदित होता हुआ प्रतीत होता है। गोपाल सागर में छज्जों तथा छतरियों का पड़ता हुआ प्रतिबिम्ब इस भाग को और अधिक मनोरम बना देता है।

सावन-भादो भवन- ये गोपाल भवन के उत्तरी व दक्षिणी पार्थों की दीर्घाएँ है जो क्रमशः सावन और भादो के रूप में स्थित । प्रत्येक भवन दो मंज़िला है जो सामने से देखने पर एक मंज़िला ही प्रतीत होता है। इस भवन में फव्वारों को कलात्मक ढंग से लगाया गया है। दीर्घाओं की छत पालकीनुमा व ढलवाँ है जिस पर पंक्तिबद्ध कलशनुमा कंगूरे लगे हैं। भवन की निचली मंज़िल का मुख्य आकर्षण वर्षा ऋतु की परिकल्पना को साकार करता है। पार्श्वभत्ति निर्मित नक्काशीयुक्त जलप्रपात तथा मध्य फव्वारायुक्त बेसिन बहुत ही सुन्दर बन पड़ा है।

सूरज भवन- यह भवन गोपाल भवन के दक्षिण पूर्व में संगमरमर-निर्मित है। खुले । बरामदोंवाले इस भवन के आंतरिक व बाह्य विशेषता भाग पर अत्यन्त आकर्षक एवं कलात्मक सृदृढ़ता पच्चीकारी की गई है। इस भवन की बारीकी मुग़ल भवनों जैसी है। भवन के प्रत्येक बरामदे के कोनों पर एक-एक कक्ष स्थित है। उद्यानों जिनकी छत अंदर से गुम्बदाकार तथा कमलाकार नक्काशी से युक्त है। ये सभी कक्ष गलियारों द्वारा आपस में जुड़े हैं। भवन के आंतरिक व बाह्य भागों में संगमरमर- पट्टिकाओं पर कलात्मक पच्चीकारी का कलात्मक कार्य किया गया है। संभवतः इस भवन का पर्यटकों निर्माण स्त्रियों के मनोरंजन व आराम को ध्यान में रखकर किया गया है। किशन भवन- यह भवन सलेटी बलुआ पत्थर से निर्मित है। भवन के मध्य व सामने मेहराबों एवं ऊर्ध्वभाग का आयताकार स्थान अरबी शैली में उत्कीर्ण है। भवन के दक्षिण भाग में ऊपर की ओर स्तम्भों पर आधारित मेहराबदार मण्डप संभवतः भरतपुर के राजा बलवंत सिंह (1825- 1853) द्वारा बनवाया गया है। भवन की छत के किनारों से लटकती पाषाण पुष्पकलियाँ व अलंकृत छज्जे भवन की शोभा में वृद्धि करते हैं। भवन के आंतरिक भाग के पार्श्व में एक दीर्घा है जो अत्यन्त सजीव अलंकरणों से परिपूर्ण है। इसकी कमानीदार पालकीनुमा छत कलात्मक उत्कीर्णन से आकर्षक बन पड़ी है। कक्ष में पाषाणपट्टिकाओं पर पुष्पपाद व मयूरांकन है। भवन के आधार पर सामने की तरफ़ दोनों ओर बहुत ही सुंदर कमलाकृतियाँ हैं।

हरदेव भवन- सूरज भवन के दक्षिण की ओर यह भवन स्थित है। इसमें एक लघु उद्यान स्थित है। इसे महाराजाओं का अन्तःपुर भी कहा जाता है। भवन का मुख्य भाग दो मंजिला है। निचले तल में एक विशाल कक्ष है जो दोहरे स्तम्भों की पंक्तियों से बने मेहराबों पर आश्रित मेहराबयुक्त मण्डप है। इस कक्ष के दोनों ओर बरामदायुक्त आयताकार कक्ष कई छोटे कक्षों से व्यवस्थित है। इसका पिछला भाग ढोलकाकार छत को वहन करता है तथा गुम्बदाकार शीर्ष व शंक्वाकार पाषाण-शिल्पों से सुसज्जित है।

उपर्युक्त सभी भवन महाराजा सूरजमल द्वारा एकसाथ बनवाए गए हैं। उक्त भवनों की निर्माण-शैली व कला को ‘जाट-कला के नाम से पुकारते हैं। इन भवनों की मुख्य विशेषता यह है कि ये भवन जाटों जैसी सृदृढ़ता व मुग़लों-जैसी कोमलता का सम्मिश्रण हैं। संक्षेप में इन भवनों की कारीगरी राजपूत शैली की है। भवनों के उद्यानों में राजपूत, पर्शियन व मुग़ल-शैली का प्रभाव होते हुए भी यह पूर्णतः निजी सौन्दर्य से युक्त है।

डीग के जलमहलों की कला व सौन्दर्य अतुलनीय है। ये महल व उद्यान अपने कलात्मक सौन्दर्य से देशी व विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र हैं। यह क्षेत्र धार्मिक स्थल के रूप में अपना विशेष स्थान रखता है। यहाँ ब्रज की चौरासी कोस की यात्रा के समय आनेवाले दर्शकों की संख्या ज्यादा होती है। यदि इस स्थल को ऐतिहासिक रूप से विकसित किया जाए तथा भरतपुर के केवलादेव घना राष्ट्रीय उद्यान (भरतपुर पक्षी विहार) में आनेवाले देशी-विदेशी पर्यटकों से जोड़ा जाए, तो इस अनुपम कृति के कलात्मक सौन्दर्य से सारा संसार परिचित हो सकेगा।