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भारत के प्राचीनतम खेल वैदिक साक्ष्य
August 27, 2018 • Navlekha Team

बालकों की भावनाएँ, बालकों की चिन्ताएँ, बालकों के खेलबालकों के चाव- इन सबका साहित्य भारत में सहस्राब्दियों पुराना हैप्रत्येक प्राचीन संस्कृति ने अपनी नयी पौध को पनपाने पर पूरा ध्यान केन्द्रित किया हैभारत में भी यह हुआ है। यह बात अलग है कि उसके पूरे अभिलेख हमें उपलब्ध हों। जो अभिलेख प्राचीनतम वाङ्मय के उपलब्ध हैं, उनमें अध्यात्म, धर्म, विज्ञान आदि तथाकथित उच्चतर तत्त्वों की खोज में लगे शोधार्थियों के गम्भीर अभियानों की व्यस्तता में हमें प्राचीनतम साहित्य में बालपाठ्य सामग्री और बालक पर केन्द्रित चिन्तन देखने की फुर्सत न मिले, वह बात भी अलग है, किन्तु हमारे प्राचीनतम वाङ्मय में जो बाल-केन्द्रित साहित्य हैउसका अभिगम अत्यन्त व्यावहारिक हैवह आज भी मूल्यवान् है, यह निर्विवाद है। उसकी जानकारी आज तक सामने नहीं लाई गई, यह एक आश्चर्यजनक तथ्य अवश्य है।

मानव के पुस्तकालय की प्राचीनतम पुस्तक ऋग्वेद से ही, जिसे विश्वभर में सर्वप्रथम उपलब्ध ग्रन्थ माना गया है, बालक्रीड़ाओं के अत्यन्त रोचक किन्तु गूढार्थपरक वर्णन मिलते हैं। उन्हें हम तक पहुँचाया ही नहीं गया, यह अत्यन्त खेदजनक है। पुरानी बालकथाओं की बात करनेवाले पण्डितगण अधिक-से-अधिक पुरानी कहानी बताएँगे तो नचिकेता की (जो कठोपनिषद् में आती है) जिसमें वाजश्रवा का पुत्र नचिकेता बालसुलभ जिज्ञासा से जन्म-मृत्यु का रहस्य जानने की ललक में यमराज तक पहुँच जाता है। और आत्मविद्या का ज्ञान लेकर ही लौटता है। वैसे यह कथा भी प्राचीनतम शिक्षण के अभिगम को संकेतित करती है, मानव की आदिम जिज्ञासा के साथ बालक की कुतूहल-वृत्ति और शिक्षा-दर्शन का प्रमाण भी देती है। यह भी बतलाया जाता रहा है। कि रूपक कथाओं (जिन्हें फेबल्स या । स या अलेगरी भी कहा जाता है) का उत्स भारत में बहुत पुराना है, पशु-पक्षियों की रूपक कथाएँ, जो पंचतंत्र में आज भी मिलती हैं, विश्व की प्राचीनतम कथाएँ हैं; क्योंकि उनमें सियारों के जो नाम करटक और दमनक आते हैं, वे हजारों वर्ष पहले अरबी की कहानियों में कलिला और दमना बन गए थे, वहीं से विश्व में फैले थे। ईसप की नीति-कथाएँ उनसे बाद की हैं। आदि। इस पर डॉ. पी.एन. कवठेकर ने भी शोध-ग्रन्थ लिखा है।

इनसे भी पहले वेद में बाल-साहित्य के जो उत्स मिलते हैं, वे कहीं अधिक मर्मस्पर्शी और तात्त्विक हैं। वैदिक बालसाहित्य दो प्रकार का है- बालकों को शिक्षा देने के लिए बना साहित्य और बालकों का रूपक लेकर ज्ञान-विज्ञान के रहस्य बतानेवाला साहित्य। अन्य प्रकार के साहित्य भी रहे होंगे। किन्तु बीती सहस्राब्दियों में कितना कुछ विलुप्त हो गया या अब अप्राप्य है, कौन कह सकता है!

कबड्डी या आँखमिचौली

एक नमूने से उस समय के अभिगम को समझा जा सकता है और अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय कैसे खेल रहे होंगे, कैसे खेल के मैदान और कैसी शिक्षण प्रणाली। ऋग्वेद का ऋषि आकाशीय ज्योतियों का प्रेक्षक था, कालगणना के रहस्यों का जिज्ञासु और प्रवक्ता भी। ऐसी एक आकाशीय प्रघटना को उसने बच्चों की कबड्डी के पाले के रूपक में जिस तरह पिरोया है, उसमें तत्कालीन बाल-जीवन का मनोरम प्रतिबिम्ब मिलता है। सब जानते हैं कि चन्द्रमा में सूर्य के प्रकाश से चाँदनी दिखती है। जब पूर्णिमा को सूर्य और चन्द्र आमने- सामने होते हैं, तब सूर्य का पूरा प्रकाश पड़ने से पूरा चाँद दिखलाई देता है। फिर खगोलीय संक्रमण के कारण जब सूर्य और चन्द्र एक बिन्दु पर आ जाते हैं, तब अमावस्या हो जाती है, चन्द्रमा नहीं दिखता। फिर दूज का चाँद उगता है जो सूर्य से दूर जाते-जाते फिर पूर्णिमा को पूर्ण चन्द्र हो जाता है, पूर्णिमा के बाद फिर जब सूर्य की और आता रहता है, तो फिर अदृश्य हो जाता है। इस खगोलीय तथ्य को ऋग्वेद के दशम मंडल में इस मनोरंजक रूपक में बाँधा गया है

पूर्वापरं चरतो माययैतौ शिशु क्रीळडनौ परि यतोअध्वरम्। विश्वान्यन्यो भुवनाभिचष्ट ऋतुज्रन्योविदधज्जायते पुनः॥

ऋग्वेद 10.85.18

अर्थात्, देखो, ऊपर के खेल का यह पाला जिसमें ये दो बालक एक दूसरे को थकाने का खेल खेल रहे हैं। एक दूसरे का पीछा करते इन दोनों में जब पहला दूसरे को छू लेता है तो वह ‘मर जाता है (गायब हो जाता है), फिर दूसरा उसे ढूँढ़ने के लिए सारे जहान में घूमता हुआ चक्कर लगाता है। उधर पहला भी दूसरे के मुँह फेरते ही फिर जी उठता है।

इनका तो यह खेल है, पर इस बहाने हमें मिल जाते हैं अनेक खगोलीय रहस्य और समस्त ऋतुओं की गणनाएँ। कैसा अद्भुत रूपक है। इस रूपक में पहला बालक सूर्य है, दूसरा चन्द्रमा। खेल शायद कबड्डी का है या आँखमिचौली का। एक को ढूँढ़ते हुए दूसरा घूमता है, वह उसे छू लेता है तो वह मर जाता है, पाले से बाहर हो जाता है। खेल के नियम के अनुसार वह फिर ‘जी' भी सकता है और फिर वह इसके पीछे उसके पाले में जाता है। इस ऋचा में खेल का स्पष्ट रूपक है, पाले का स्पष्ट वर्णन है (अध्वरम्), किन्तु उसके बहाने मासगणना और वर्षगणना का रहस्य भी बता दिया गया है। इस हृदयावर्जक वर्णन की मट्टीपलीद तथाकथित गम्भीर भाष्यकारों ने कर दी हो और केवल विज्ञान निकालने की ललक में बाल-क्रीड़ा के नियमों की अनदेखी कर दी हो तो यह वेद के उस ऋषि का दोष नहीं । है जो सच्चे अर्थों में कवि है, मार्मिक रूपक परोस रहा है। इसी आधार पर नवो नवो भवति जायमानः आदि चन्द्रमा के मंत्र खूब बोले जाते हैं (चन्द्रमा हर माह नया पैदा होता है आदि)। कबड्डी में ‘मर जाने और ‘जी उठने' की पारिभाषिक संज्ञाएँ आज भी चल रही हैं।

शायद यह विश्व का सर्वप्रथम बालसाहित्य का नमूना हो, जिसमें खेल के कायदे-कानून भी हैं, बाल-साहित्य भी, अलंकार भी, खगोलीय विज्ञान भी। अब आप इस पाले में पृथिवी का क्रान्तिवृत्त देख लें, उपग्रह चन्द्रमा के संचरण और चन्द्रसूर्य के एक बिन्दु पर रहने, मास-गणना और ऋतुगणना करने के संकेत देख लें, या तत्कालीन शिशुओं की क्रीड़ा के तरीके देख लें। खेद की बात यह है कि विद्वानों ने उपनिषदों में तो बाल-साहित्य की तलाश की है, पुराणों से तो सारे ही बालोपयोगी सन्दर्भ, शिशुकथाएँ, रूपक कथाएँ आदि मिली हैं, मदालसा-जैसी माताओं की गाई लोरियाँ मिली हैं जिनमें बालकों को जीवन-दर्शन की शिक्षाएँ गीतों और कविताओं में दी जाती थी, किन्तु वैदिक वाङ्मय में क्या कुछ बालपरक चिन्तन है, इस पर कोई कार्य नहीं हुआ है। इसकी वाञ्छनीयता बतलाने में भी झिझक होती है। कि शिखरस्थ विद्वान् कहीं वेद-जैसी महनीय वाङ्मय-निधि में बाल पाठ्य सामग्री ढूँढ़ने की बात को अवमानना मानकर रुष्ट न हो जायें। किन्तु ऐसी सामग्री वेदों में बहुत है और वह है भी अत्यन्त मार्मिक तथाकथित शिखर विद्वानों ने गरिमा के नाम पर ऐसी सामग्री की उपेक्षा की हो या उसे भी खींच-तानकर उसके अर्थों को बिगाड़ दिया हो तथा मार्गभ्रमित कर दिया हो, यह अवश्य सम्भव है। ऐसा हुआ भी है। ऊपर एक नमूना हमने इसी दृष्टि से उद्धृत किया है। इसके अर्थों की भी अनेक व्याख्याकारों ने दुर्गति ही की है, यह हम संकोच और क्षमा-प्रार्थनापूर्वक कहे बिना नहीं रह सकते। पुराणों में तथा श्रीमद्भागवत आदि परवर्ती ग्रन्थों में तो बालगोपालों की, बलराम-श्रीकृष्ण आदि की क्रीड़ाओं के वर्णन मिलते ही हैं, वेदजैसे प्राचीनतम ग्रन्थों में भी उनका स्पष्ट उल्लेख है, यही इस निवेदन का आशय है।

(लेखक भारत के राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित, 'भारती' (संस्कृत मासिक) के प्रधान सम्पादक, संस्कृत आयोग (भारत सरकार) के सदस्य, राजस्थान संस्कृत अकादमी तथा आधुनिक संस्कृत पीठ (ज.रा. राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय) के पूर्व अध्यक्ष तथा संस्कृत शिक्षा एवं भाषा विभाग (राजस्थान सरकार) के पूर्व निर्देशक हैं।)