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मर्म-चिकित्सा पद्धति
August 25, 2018 • Navlekha Team

मानव-शरीर आरोग्य का मन्दिर II एवं साहस, शक्ति, उत्साह का । समुद्र है, क्योंकि इस मनुष्यशरीर में परमात्मा का वास है। स्कन्दपुराण के अनुसार मनुष्य की नाभि में ब्रह्मा, हृदय में श्रीविष्णु एवं चक्रों में श्रीसदाशिव का निवासस्थान है। ब्रह्मा वायुतत्त्व, रुद्र अग्नितत्त्व एवं विष्णु सोमतत्त्व के बोधक हैं। यह विचारणीय विषय है कि परमात्मा का वास होने पर यह शरीर रोगी कैसे हो सकता है? यदि हम इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार करें तो हमें उन समस्त समस्याओं का समाधान इसी शरीर से प्राप्त हो जाता है। योग, प्राणायाम एवं मर्म- चिकित्सा के माध्यम से शरीर को स्वस्थ कर आयु और आरोग्य-संवर्धन के संकल्प को पूरा किया जा सकता है। जहाँ योग और प्राणायाम ‘स्वस्थस्यस्वास्थ्य- रक्षणम्' के उद्देश्य की पूर्ति करता है, वहीं मर्म- चिकित्सा तुरन्त कार्यकारी एवं सद्यःफलदायी होने से रोगों को कुछ ही समय में ठीक कर देती है। यह आश्चर्यजनक, विस्मयकारी चिकित्सा- पद्धति बौद्ध-काल में बुद्धधर्म के प्रचार-प्रसार के साथ दक्षिण-पूर्वी एशिया सहित सम्पूर्ण विश्व में एक्युप्रेशर, एक्युपंचर आदि अनेक विधाओं के रूप में विकसित हुई।

अनुमानों पर आधारित विज्ञान द्वारा किसी भी तथ्य को सम्पूर्णता से जानना सम्भव नहीं है। अतः मर्मविज्ञान की समीक्षा वर्तमान वैज्ञानिक मानदण्डों के आधार पर करना युक्तिसंगत और समीचीन नहीं है। इसके आधार पर मर्म-विषयक किसी एक पक्ष का ज्ञान ही प्राप्त हो सकता है। समवेत परिणामों की समग्र समीक्षा इसके माध्यम से संभव नहीं है।

मर्मचिकित्सा एक ऐसी चिकित्सा- पद्धति है जिसमें अल्प समय में थोड़े-से अभ्यास से अनायास उन सभी लाभों को प्राप्त किया जा सकता है जो किसी भी प्रकार की प्रचलित व्यायाम-विधि द्वारा मनुष्य को उपलब्ध होता है। आवश्यकता मर्मविज्ञान एवं मर्म-चिकित्सा के प्रचार एवं प्रसार की है, जिससे अधिक-से-अधिक लोग इस चिकित्सा-पद्धति का लाभ उठा सकें। जहाँ अन्य चिकित्सा-पद्धतियों का इतिहास कुछ सौ वर्षों से लेकर हजारों वर्ष तक का माना जाता है, वहीं मर्म चिकित्सा पद्धति को कालखण्ड में नहीं बाँधा जा सकता। मर्म-चिकित्सा द्वारा क्रियाशील किया जानेवाला तंत्र (107 मर्मस्थान) इस मनुष्य-शरीर में मनुष्य के विकास-क्रम से ही उपलब्ध हैं। समस्त चिकित्सा-पद्धतियाँ मनुष्य द्वारा विकसित की गई हैं, परंतु मर्मचिकित्सा प्रकृति/ईश्वरप्रदत्त चिकित्सापद्धति है। अतः इसके परिणामों की तुलना अन्य चिकित्सा-पद्धतियों से नहीं की जा सकती। अन्य किसी भी पद्धति से अनेक असाध्य रोगों को मर्म-चिकित्सा द्वारा आसानी से उपचारित किया जा सकता है। मर्म-चिकित्सा ईश्वरीय विज्ञान है, चमत्कार नहीं। इसके सकारात्मक प्रभावों से किसी को चमत्कृत एवं आश्चर्यचकित होने की आवश्यकता नहीं, आश्चर्य तो अपने शरीर को न जानने-समझने का है कि हम इनको न जानकर भयावह कष्ट भोग रहे हैं। इस मानव-शरीर में असीम क्षमताएँ एवं सम्भावनाएँ हैं; मर्म-चिकित्सा तो स्वास्थ्यविषयक समस्याओं के निवारण का एक छोटा-सा उदाहरणमात्र है।

ईश्वर ने मनुष्य-शरीर में स्वास्थ्य- संरक्षण, रोग-निवारण एवं अतीन्द्रिय शक्तियों को जागृत करने हेतु 107 मर्मस्थानों का सृजन किया है। कई मर्मों की संख्या 1 से 5 तक है। ईश्वर की उदारता का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है। कि उसने 4 तल हृदय मर्म, 4 इन्द्रवस्ति आदि मर्म बनाए हैं, जिसका आवश्यकतानुसार (अंगभंग होने की अवस्था) प्रयोग कर लाभान्वित हुआ जा सकता है। मर्म-चिकित्सा विश्व की सबसे सुलभ, सस्ती, सार्वभौमिक, स्वतंत्र और सद्यःफल देनेवाली चिकित्सा पद्धति कही जा सकती है। बिना ओषधि प्रयोग एवं शल्य-कर्म के रोग-निवारण की क्षमता इस शरीर में देकर ईश्वर ने मानवता पर परम उपकार किया है।

मनुष्य-शरीर की क्षमताओं का आकलन करने से पूर्व यह जानना आवश्यक है कि यह शरीर ईश्वर की । सर्वोत्तम कृति है। समस्त लौकिक और पारलौकिक क्षमताएँ/सिद्धियाँ इसी के माध्यम से पाई जा सकती हैं। यह शरीर मोक्ष का द्वार है। नव दुर्गों (किलों) से रक्षित यह नगरी (शरीर) ही स्वर्ग है। यह नवदुर्ग या नवद्वार हमारी इन्द्रियाँ हैं। मर्म- चिकित्सा हजारों साल पुरानी वैदिक चिकित्सा-पद्धति है। परिभाषा के अनुसार, ‘या क्रियाव्यापिहरणी सा चिकित्सा निगद्यते' अर्थात् कोई भी क्रिया, जिसके द्वारा रोग की निवृत्ति होती है, वह चिकित्सा कहलाती है। चिकित्सा-पद्धतियों की प्राचीनता पर विचार करने से यह स्पष्ट है कि ओषधियों के गुण- धर्म और कल्पना का ज्ञान होने से पूर्व स्वस्थ रहने के एकमात्र उपाय के रूप में मर्म-चिकित्सा का ज्ञान जनसामान्य को ज्ञात था। उस समय स्वास्थ्य-संवर्धन एवं रोगों की चिकित्सा के लिए मर्म-चिकित्सा का प्रयोग किया जाता था। अत्यंत प्रभावशाली होने तथा अज्ञानतावश की गई मर्म-चिकित्सा के घातक प्रभाव होने से इस पद्धति का स्थान आयुर्वेदीय ओषधि- चिकित्सा ने ले लिया तथा यह पद्धति मर्मचिकित्साविदों द्वारा गुप्तविद्या के रूप में परम्परागत रूप से सिखाई जाने लगीव्यापक प्रचार एवं शिक्षण के अभाव में यह विज्ञान लुप्तप्राय हो गया। सही स्वरूप एवं विधि से उपयोग करने से अत्यन्त सद्यःफलदायी एवं गलत ढंग से प्रयोग करने पर अत्यंत घातक होने के कारण मर्म- चिकित्सा का ज्ञान हजारों वर्ष तक अप्रकाशित रखा गया। इसको अनेक ऋषियों ने अपने अभ्यास एवं ज्ञानचक्षुओं से जाना तथा लोकहितार्थ उसका उपयोग किया। प्राचीन काल में इस विद्या को गुप्त रखने का क्या उद्देश्य रहा होगा, इसको जानने से पहले यह जानना आवश्यक है कि मर्म क्या है? चिकित्सकीय परिभाषा के अनुसार ‘मारयन्तीति मर्माणि' अर्थात् शरीर के वे विशिष्ट भाग, जिन पर आघात करने अर्थात् चोट लगाने से मृत्यु संभव है, उन्हें मर्म कहा जाता है। इसका सीधा अर्थ है कि शरीर के ये भाग अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है तथा जीवनदायिनी ऊर्जा से युक्त हैं। इन पर होनेवाला आघात मृत्यु का कारण हो सकता है। इन स्थानों पर प्राणों का विशेष रूप से वास होता है। अतः इन स्थानों की यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए।

अभी तक मर्मविज्ञान के विषय में अधिक जानकारी न होने के कारण इस महत्त्वपूर्ण विद्या का प्रचार-प्रसार नहीं हो पाया। इसके उपयोग के विषय में अधिकांश आयुर्वेदज्ञ अनभिज्ञ रहे हैं। मर्मों के वर्णन को मात्र शरीर-रचना का विषय मान लिया गया। मैं सुश्रुतसंहिता षष्ठ अध्याय ‘मर्म निर्देश' नामक अध्याय में डॉ. भास्कर गोविन्द घाणेकर के विमर्श का कुछ अंश उद्धृत करना चाहूँगा। डॉ. घाणेकर के अनुसार, ‘मर्म शब्द की निरुक्ति उपर्युक्त प्रकार से ग्रंथों में वर्णित है और व्यवहार में भी मर्म पर आघात या प्रहार होने से (हृदय के संबंध से मानसिक आघात होने से भी) मृत्यु हो जाती है, ऐसी कल्पना है। इन स्थानों पर आघात होने से जीव का नाश होता है, इसलिए ये जीवस्थान ‘वाइटल पार्ट्स' भी कहलाते हैं। जीवस्थान एवं वाइटल पार्ट्स' का योगार्थ एक ही है। मर्म विवरण आयुर्वेदिक शरीर के विशेष भाग , इसमें संदेह नहीं, परंतु इसकी विशेषताओं का हमें ठीक आकलन नहीं हो रहा है।'

अनुभव से सिद्ध हुआ है कि यदि इन स्थानों पर समुचित शास्त्रोक्त चिकित्साक्रियाविधि का उपयोग किया जाए तो शरीर को निरोगी एवं चिरायु बनाया जा सकता है। साथ ही विभिन्न सुखसाध्य, कृच्छ्रसाध्य एवं असाध्य रोगों से मुक्ति पाई जा सकती है। मर्मविद्या के द्वारा जहाँ एक ओर लौकिक/पारलौकिक सुखों की प्राप्ति संभव है, वहीं इस विद्या के दुरुपयोग से यह घातक भी हो सकती है। अतः प्राचीन काल में यह विद्या राजाओं एवं योद्धाओं को ही सिखाई जाती थी। वर्तमान संदर्भ में यह समय वेदविद्या-प्रकाशन का काल है। हजारों वर्षों से अप्रकाशित वैदिक ज्ञान को आज के संदर्भ में लोककल्याण हेतु प्रस्तुत करने की आवश्यकता है।