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ग्वालियर रियासत की डाक-प्रणाली
August 25, 2018 • Navlekha Team

भारत में डाक-टिकट पहली बार सन् 1852 में सिंध-डाक के नाम से जारी किया गया था और 1854 में ये अखिल भारतीय स्तर पर आधा आना, एक आना, दो आना व चार आना कीमत के अनुसार के थे, जो लीथो- पद्धति से स्टोन डाई द्वारा छापे गए थे। इस पर महारानी विक्टोरिया की मुखाकृति बनी थी। इस दौरान ग्वालियर के रेजीडेंट पोस्ट ऑफिस से जारी पत्रों पर ये टिकट लगाकर भेजे जाने लगे थे।

सन् 1885 में ब्रिटिश साम्राज्य व ग्वालियर दरबार के बीच दूसरी डाक संधि हुई, जिसके तहत ग्वालियर राज्य को अपने राज्य में सुव्यवस्थित रूप से स्वयं की नियमित डाक-प्रणाली पुनः जारी करने का प्रावधान किया गया। इस प्रणाली के लिए नियम व डाक-दरों का प्रावधान ब्रिटिश भारत की तरह ही था, किन्तु प्रयोग किए जानेवाले ब्रिटिश डाक-टिकटों, लिफाफों आदि पर हिंदी व अंग्रेजी में ‘ग्वालियर अतिरिक्त रूप से छपा रहता था, इसके लिए ब्रिटिश सरकार कोई अतिरिक्त राशि नहीं लेती थी। इस संधि में मुख्य बात यह थी कि जहाँ अन्य देशी रियासतों को अपने डाक टिकटवाली सामग्री मात्र अपने राज्य में ही प्रयोग करने का अधिकार था, वहीं ग्वालियरवाले डाक टिकट युक्त सामग्री ब्रिटिश साम्राज्य में भेजने के लिए अधिकृत थी। इस दौरान राज्य के पहले पोस्टमास्टर जनरल पं. शिवचरण थे। इसके बाद जल्द ही ग्वालियर रियासत के डाकखानों द्वारा पोस्टकार्ड, लिफाफों के साथ-साथ रजिस्ट्री-पत्र व मनीऑर्डर की सुविधा भी उपलब्ध करा दी गई।

यह है ग्वालियर की डाक-व्यवस्था का इतिहास

ग्वालियर राज्य-क्षेत्र में मराठों के आने के बाद ही नियमित डाक-सेवा शुरू हुई थी। यह डाक-सेवा दो प्रकार की थी, इसमें प्राथमिक राजकीय स्तर पर थी। इसमें राज्य की ओर से हरकारे नियुक्त किए गए थे, जो निर्धारित मार्ग पर एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव तक बढ़नेवाले हरकारों को डाक का स्थानान्तरण कर गन्तव्य स्थान तक डाक को सुरक्षित पहुँचा देते थे। राजधानी ग्वालियर से एक मार्ग नरवर, शिवपुरी, गुना, सुथालिया, ब्यावरा, पचौर, शाजापुर, उज्जैन जाता था। यही मार्ग आगे बीकमगाँव, असीरगढ़, बुरहानपुर, सीसर होता हुआ पूना पेशवाओं की सेवा में पहुँचता था। दूसरा रास्ता अकबरपुर, कालपी, जहानाबाद होता हुआ इलाहाबाद पहुँचता था। इलाहबाद से ईस्ट इण्डिया कंपनी द्वारा नियमित रूप से कलकत्ता तक डाक पहुँचाई जाती थी। वहीं तीसरा मार्ग मुरैना, धौलपुर, आगरा, मथुरा, कोसी, होडल, वल्लभगढ़ होता हुआ शाहजहानाबाद-दिल्ली पहुँचता था। शासकीय पत्रों के अलावा सर्वसाधारण को यह सुविधा उस समय मात्र उच्च अधिकारियों की दया पर निर्भर थी।

यह व्यवस्था जानकारी के अनुसार ईस्ट इण्डिया कंपनी की डाक व्यवस्था से कहीं ज्यादा जल्दी पहुँचनेवाली, सुव्यवस्थित व सस्ती भी थी। सन 1837 में ईस्ट इण्डिया कंपनी द्वारा एक पोस्ट ऑफिस अधिनियम पास किया, जिसके तहत कंपनी ने देश में डाक-व्यवस्था पर अपना एकाधिकार घोषित कर दिया, लेकिन ग्वालियर राज्य द्वारा इस अधिनियम को मानने से इनकार करते हुए कंपनी सरकार को पत्र लिखा गया कि ग्वालियर एक सर्वभौमिक राज्य है व ब्रिटिश राज्य के लिए बनाए कानून इस पर लागू नहीं हैं। अतः उसकी डाक-व्यवस्था व कंपनी-क्षेत्र में उसकी डाक-चौकियाँ व ग्वालियर राज्य में कंपनी की डाक-चौकियाँ पहले की तरह बनी रहीं।

इसके बाद कंपनी-सरकार ने सन 1853 में दोबारा एक मसौदा ग्वालियरदरबार को भेजा, जिसके अन्तर्गत कंपनी सरकार ने यह वादा किया कि यदि ग्वालियर राज्य, कंपनी सरकार की सीमाओं में स्थित अपनी डाक-चौकियाँ उठा ले, तो वह ग्वालियर दरबार की समस्त सरकारी डाक को सम्पूर्ण भारत में निःशुल्क भेजने की ज़िम्मेदारी लेती है। इस पर ग्वालियर दरबार ने अपने राजकीय पत्राचार के खर्चे को बचाने के लिए अपनी डाक-चौकियाँ कंपनी सरकार की सीमाओं से उठा लीं। इस तरह कंपनी सरकार का डाक-व्यवस्था पर एकाधिकार हो गया। सन् 1854 के पोस्ट ऑफिस एक्ट द्वारा सम्पूर्ण देश में एक जैसी डाक-दरें निर्धारित किए जाने व ‘बैगी डाक' कलकत्ता से ग्वालियर राज्य तक बढ़ा लेने से ग्वालियर राज्य की राजकीय डाक-व्यवस्था भी धीरे-धीरे समाप्त हो गयी। उस समय ‘बैगी डाक’ को कलकत्ता से ग्वालियर राज्य तक डाक लाने में 9 दिन चार घंटे का समय लगता था।

वहीं सन् 1906 से 1925 तक का समय राज्य की डाक-व्यवस्था के पुनरुत्थान का समय था। इस समय तत्कालीन महाराज माधवराव सिंधिया (1886-1925) द्वारा राज्य के गाँव-गाँव में डाक-व्यवस्था का जाल बिछाने के लिए कई नीतियों की घोषणा की गई, जिसके तहत उस समय नये पोस्टऑफिसों के लिए नयी पक्की इमारतों को बनाने के स्थान पर छोड़ दिए गए भवनों के इस्तेमाल पर जोर दिया गया। इसके तहत छोटे गाँवों में जहाँ प्राथमिक शालाएँ थीं, वहाँ डाककर्मचारियों की नियुक्ति के स्थान पर अध्यापकों को वेतन के अतिरिक्त कमीशन के आधार पर डाक-सामग्री बेचने, डाक एकत्र कर हरकारे को सौंपने व हरकारे से लेकर डाक गाँव में बाँटने-जैसे कार्य सौंपकर न्यूनतम खर्चे पर डाक-व्यवस्था को बहुत लोकप्रिय, उपयोगी व राजस्व में वृद्धि का साधन बनाया गया।

जहाँ तार व टेलीफोन के आविष्कार ने राज्य की डाक-व्यवस्था को और भी अधिक राजस्व प्रदान किया, वहीं सर्वसाधारण, व्यापारियों व राजकीय कार्यप्रणाली में भी थोड़ी-बहुत सुविधाएँ प्राप्त होती गयीं। ग्वालियर राज्य के भारत गणराज्य में विलीनीकरण होने के समय ग्वालियर राज्य में कुल 225 डाकघर थे, जिनसे कुल वार्षिक आय तकरीबन सवा लाख रुपये थी। ग्वालियर राज्य की डाकव्यवस्था 1948 तक जारी रही, लेकिन यहाँ के डाक-टिकट व लिफाफे 1950 तक चलन में रहे।